पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कपड़ा बुनने वाले मजदूर नहीं खिला पा रहे अपने बच्चों को रोटी

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नोटबंदी ने देश के लघु उद्योगों की कमर तोड़ दी है। पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में छोटे कामगारों की स्थिति मरणासन अवस्था में पहुंच चुकी है। कपड़ा बुनने वाले दिहाड़ी मजदूर दिन के 250 रूपये भी नहीं कमा पा रहे जिससे की वह अपने बच्चों को रोटी खिला सके। वाराणसी के अलावा यहीं स्थिति कमोबेश यूपी के अन्य जिलों में भी बनी हुई है जिसमें अलीगढ़, मुरादाबाद व अन्य जिले आते है।

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photo courtesy: Indian Express

वाराणसी के रेशमी कपड़े की बुनाई करने वाले जैनुल आबेदीन भूखमरी के कगार पर पहुंच गया है। उसे फ्रिक है कि कैसे वो अपने बच्चों को रोटी खिला पाएगा। अगर ऐसा ही चला तो उसका परिवार शायद ही एक महीने तक जिंदा रह पांए।

जनसत्ता की खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में जैनुल आबेदीन अपने घर के मिट्टी से बने फर्श की ओर देखते हैं। उनके पीछे दर्जनों हैंडलूम बिकने का इंतजार कर रहे हैं। आबेदीन उन लोगों में से एक हैं, जिनका काम नोटबंदी के बाद ठप पड़ चुका है।

आबेदीन की तरह और भी लोग हैं जो 250 रुपये प्रति दिन कमाते हैं, लेकिन अगर इन्हें साथ जोड़ दें तो यह 1 खरब रुपये की इकॉनमी बन जाती है, जो इंडोनेशिया की इकॉनमी से ज्यादा है। वाराणसी के मशहूर रेश्मी कपड़े बनाने वाले आबेदीन कहते हैं कि मोदी के नोटबंदी के फैसले ने हमारी कमर तोड़ दी है। अब ज्यादा दिनों तक अपने बच्चों को खिला नहीं पाऊंगा। एेसे ही चला तो हम बुनकर एक महीने से ज्यादा जिंदा नहीं रह पाएंगे।

इस तरह की परेशानियों पर सरकार और सरकार के नुमाइन्दे वहीं रटी-रटाई बातें दुहराने लगते है। वाराणसी में बीजेपी के अध्यक्ष हंसराज विश्वकर्मा कहते हैं कि कुछ चीजें मोदी बदलना चाहते हैं। थोड़े समय के लिए लोगों को परेशानियां झेलनी पड़ेंगी, लेकिन भविष्य में देश की इकनॉमी को इससे फायदा होगा।

जबकि इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक अर्थशास्त्रियों और एशियन डिवेलपमेंट बैंक ने इस साल से लेकर मार्च तक इकनॉमी में गिरावट का अनुमान लगाया है। वहीं रिजर्व बैंक ने इसे लेकर बेहद चौकस है। उसने अनुमान लगाया है कि नोटबंदी का प्रभाव थोड़े समय के लिए ही पड़ेगा। मगर फिर भी ज्यादा डेटा की समीक्षा करनी पड़ेगी। जो पैसा रिप्लेस किया जा रहा है, उसकी प्रक्रिया नए बिल्स, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और सरकारी खर्च में बढ़ावा है, जिसमें महीनों का वक्त लगेगा।

सरकार सब्ज़ाबाग तो दिखा देती है लेकिन असल समस्या है कि वाराणसी के बुनकरों का कामकाज अनौपचारिक व्यवसायों में से एक है और इसमें भुगतान का तरीका भी अलग है। जब साड़ी बनाने वाले अॉर्डर डिलीवर करते हैं तो उन्हें एक बेयर चेक मिलता है। बैंक में पहुंचने से पहले  साहूकार के हाथों से यह न जाने कितने ही सप्लायर्स के अकाउंट्स से गुजरता है

लंदन स्थित इंटरनैशनल ग्रोथ सेंटर के कंट्री डायरेक्टर प्रोणब सेन कहते हैं कि छोटे निर्माता अनौपचारिक क्षेत्र से उधार लेते हैं। लेकिन अब साहूकार कहते हैं कि उन्हें नई करंसी में पैसा चाहिए। उनकी रोज की दिहाड़ी भी कैश में होती है। उनके मुताबिक साहूकार इस देश की इकनॉमी में अहम रोल निभाते हैं।

ज्यादा रेट चार्ज कर वह कुछ गारंटी के सहारे पैसा दे देते हैं। आपको बता दें कि इस देश में 1 लाख लोगों पर 13 बैंकों की शाखाएं हैं। इसके अलावा 4 में से सिर्फ एक शख्स की इंटरनेट तक पहुंच है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि एकल परिवार चलाने वाले करीब 96 प्रतिशत लोग संगठित गैर-कृषि उद्यमों को चलाते हैं। वहीं केवल एक प्रतिशत को ही सरकार से लोन मिल पाता है।

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