गौरक्षकों द्वारा हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका

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उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर कर केंद्र और कुछ राज्यों को उन तथाकथित गौरक्षकों के खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश देने की मांग की गई है जो दलितों तथा अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित तौर पर हिंसा फैला रहे हैं।

पीटीआई भाषा के अनुसार, कांग्रेस कार्यकर्ता तहसीन एस पूनावाला की इस जनहित याचिका में कहा गया है कि इन ‘गौरक्षा समूहों’ द्वारा की जा रही हिंसा इस हद तक पहुंच गई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों इन लोगों को ‘समाज का विनाश करने वाले’ लोग घोषित कर दिया।

 

याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये समूह गायों तथा अन्य गौवंशों की रक्षा के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों पर ज्यादती कर रहे हैं और सामाजिक सद्भाव, जन मूल्यों तथा देश में कानून और व्यवस्था के हितों के लिए इन्हें नियमित करने एवं इन पर प्रतिबंध लगाने की जरूरत है। इस याचिका में कहा गया है ‘इन तथाकथित गौरक्षक समूहों का खतरा देश के लगभग हर कोने में है और विभिन्न समुदायों तथा जातियों के बीच वैमनस्य पैदा कर रहा है।’याचिका में कहा गया है कि इन तथाकथित गौ रक्षा समूहों की ओर से सोशल मीडिया पर अपलोड की गई कथित ‘हिंसक सामग्री’ को हटाए जाने का आदेश भी दिया जाए।

पूनावाला की इस याचिका में गुजरात पशु रोकथाम कानून 1954 की धारा 12, महाराष्ट्र पशु रोकथाम कानून 1976 की धारा 13 और कर्नाटक गौवध रोकथाम एवं पशु संरक्षण कानून 1964 की धारा 15 को ‘असंवैधानिक’ घोषित करने की मांग की गई है। यह धाराएं कानून अथवा नियमों के दायरे में अच्छी भावना से काम करने वाले लोगों को संरक्षण का प्रावधान करती हैं। याचिका में कहा गया है ‘अधिनियम के तहत प्रदत्त ये कानून और सुरक्षा इन तथाकथित समूहों की हिंसा के लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं।’

इस याचिका में गृह मंत्रालय, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान और झारखंड की सरकारों को पक्षकार बनाया गया है। तथाकथित गौरक्षक समूहों पर कार्रवाई की मांग करते हुए याचिका में कहा गया है कि इनके द्वारा की गई ज्यादतियां भारतीय दंड संहिता तथा अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार की रोकथाम) कानून 1989 के विभिन्न प्रावधानों के तहत दंडनीय है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई मामलों में पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों की या तो इन गैरकानूनी कृत्यों में मिलीभगत रही है या उनकी भूमिका केवल मूक दर्शक की रही है। इसमें कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सबको जीवन एवं निजी स्वतंत्रता का अधिकार है और तथाकथित गौरक्षक समूहों की कार्रवाइयां इस अनुच्छेद का उल्लंघन करती हैं।

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