नेटवर्क 18 ने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में रिपोर्टर द्वारा भेजे गए जस्टिस थिप्से के इंटरव्यू को चलाने से किया ‘इनकार,’ चैनल ने कहा हमने रिपोर्टर को भेजा ही नहीं था

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गुजरात के बहुचर्चित कथित सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामला एक बार फिर से सवालों के घेरे में आ गया है। इस बार सवाल उठाया है एक पूर्व जस्टिस अभय थिप्से ने जो बॉम्बे हाईकोर्ट में जज रह चुके हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस रहते हुए मामले में 4 आरोपियों की जमानत अर्जी सुन चुके अभय ठिप्से का कहना है कि मामले में न्याय प्रणाली फेल होती नजर आ रही है।

इंडियन एक्सप्रेस अखबार से हुई बातचीत में थिप्से ने कहा कि इस मामले में कई तरह की गड़बड़ियां हैं, जिससे लगता है कि मामले के गवाह दबाव में हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय एम थिप्से ने सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले से जुड़े हाई-प्रोफाइल आरोपियों की रिहाई, जजों के तबादले और गड़बड़ियों पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। थिप्से ने भी बॉम्बे हाईकोर्ट में इस मामले से जुड़ी 4 जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की थी।

थिप्से ने कहा कि हाईकोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर मामले की दोबारा सुनवाई करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मामले के ऐसे कई पहलू हैं जो सामान्य समझ के उलट है। एक्सप्रेस से खास बातचीत में जस्टिस थिप्से ने कहा कि उन्हें इस मामले में कुछ गड़बड़ी नजर आई है जिस पर हाईकोर्ट को जांच के आदेश देने चाहिए। जस्टिस थिप्से ने सख्त टिप्पणी करते हुए सोहराबुद्दीन मामले को न्याय तंत्र की विफलता भी करार दिया है।

जस्टिस थिप्से ने कहा कि जज लोया की मौत के बाद उपजे विवादों के संदर्भ में उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर पढ़ी थी, जिसमें गवाह अपने बयान से मुकर रहे थे। केस में बढ़ती उलझनों को देखकर ही उन्होंने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में दिए गए आदेशों को पढ़ा तो पाया कि उसमें कई असामान्य चीजें हैं। हालांकि, जस्टिस थिप्से ने जज लोया की मौत पर कोई टिप्पणी तो नहीं की, लेकिन इतना जरूर कहा कि वह अप्राकृतिक था।

एक्सप्रेस से बातचीत में जस्टिस थिप्से ने कहा कि, आप (रिपोर्टर) यह मानते हैं कि उसका (सोहराबुद्दीन) अपहरण हुआ था। आप यह भी मानते हैं कि यह फर्जी एनकाउंटर था। आपको इस बात पर भी विश्वास है कि उसे ग़ैर-क़ानूनी तरीके से फार्महाउस में रखा गया था। लेकिन आप यह नहीं मानते कि इसमें वंजारा (तत्कालीन डीआईजी, गुजरात), दिनेश एमएन (तत्कालीन एसपी, राजस्थान) या राजकुमार पांडियन (तत्कालीन एसपी, गुजरात) शामिल थे। किसी कांस्टेबल या इंस्पेक्टर स्तर के पुलिसकर्मी का सोहराबुद्दीन से कोई संपर्क कैसे हो सकता है?

उन्होंने कहा कि आप (रिपोर्टर) कहना चाहते हैं कि एक सब-इंस्पेक्टर सोहराबुद्दीन को हैदराबाद से उठाकर दूसरे राज्य में ले आया? वहीं इसी आधार पर आप कहते हैं कि दोनों एसपी (पांडियन, दिनेश) के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता। तो शक इस बात से पैदा होता है कि वरिष्ठ अधिकारियों से अलग रवैया रखा गया।’ जस्टिस थिप्से ने कहा इन आदेशों की उचित मंच पर समीक्षा किए जाने की जरूरत है, साथ ही हाईकोर्ट को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए। जस्टिस थिप्से ने जज बीएच लोया की मौत मामले में भी संदेह जताया है और सामान्य ज्ञान के विपरीत कुछ घटनाओं पर उंगली उठाई है।

नेटवर्क 18 पर जस्टिस थिप्से का इंटरव्यू दबाने का आरोप

इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर प्रकाशित होने के बाद तमाम टीवी चैनलों के संवाददाताओं ने बुधवार को जस्टिस थिप्से का इंटरव्यू लेने के लिए उनके घर पहुंचे। जानकारी के मुताबिक जस्टिस थिप्से ने एबीपी न्यूज, सीएनएन न्यूज 18 और एनडीटीवी के संवाददाताओं को इंटरव्यू दिया। हालांकि इनमें से सीएनएन न्यूज 18 का रिपोर्टर उस वक्त उदास हो गया जब नोएडा स्थित फिल्म सिटी के उसके हेड ऑफिस ने जस्टिस थिप्से का इंटरव्यू चलाने से इनकार कर दिया।

नाम न छापने की शर्त पर एक सोर्स ने ‘जनता का रिपोर्टर’ को बताया कि रिपोर्टर ने जस्टिस थिप्से का इंटरव्यू लेकर ऑफिस में भेजा, लेकिन चैनल के असाइनमेंट डेस्क ने उस इंटरव्यू को यह कहते हुए लेने से ही मना कर दिया कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। चैनल के इस रवैये से रिपोर्टर उदास गया। वहीं एबीपी न्यूज़ और एनडीटीवी दोनों चैनलों पर न्यायमूर्ति (रिटायर्ड) थिप्से का लिया गया इंटरव्यू पूरी तरह से प्रसारित किया गया था।

असाइनमेंट डेस्क के एक सोर्स ने कहा कि, “यह एक बड़ा इंटरव्यू था और हमारे कैमरे में जज ने सनसनीखेज खुलासा किया था। लेकिन, रिपोर्टर को स्पष्ट रूप से बताया गया कि साक्षात्कार किसी कारण की वजह से प्रसारण नहीं किया जाएगा। रिपोर्टर ने कहा कि साक्षात्कार चलाने या छोड़ने का निर्णय चैनल प्रबंधन का है, लेकिन असाइनमेंट डेस्क को कम से कम फ़ीड लेनी चाहिए। लेकिन संवाददाता का तर्क को खारिज कर दिया गया।”

चैनल ने आरोपों को किया खारिज

हालांकि सीएनएन-न्यूज 18 के वरिष्ठ संपादक भूपेंद्र चौबे ने ‘जनता का रिपोर्टर’ से बातचीत में इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि रिपोर्ट में कोई सच्चाई नहीं है क्योंकि समूह ने जस्टिस थिप्से के साथ बातचीत करने के लिए किसी रिपोर्टर को भेजा ही नहीं गया था और कोई रिपोर्टर अपने आप गया था।

चौबे से प्रतिक्रिया मिलने के बाद, हमने एक बार फिर न्यूज़ 18 के असाइनमेंट डेस्क पर कार्यरत अपने सोर्स से संपर्क किया। सोर्स ने बताया कि चौबे के दावों में कोई सच्चाई नहीं है, क्योंकि नेटवर्क 18 समूह ने दो संवाददाताओं को जस्टिस थिप्से के पास भेजा गया था, जिनमें एक हिंदी और अंग्रेजी के रिपोर्टर शामिल थे।

असहज महसूस कर रहे थे जस्टिस थिप्से

बता दें कि जब जस्टिस थिप्से से पूछा गया कि आपने क्यों और कैसे तय किया कि फर्जी मुठभेड़ केस में अपनी चुप्पी तोड़ें तो उन्होंने कहा कि वो इस केस में असहज महसूस कर रहे थे, क्योंकि 38 में से 15 आरोपियों को छोड़ा जा चुका था। उन्होंने कहा कि वो डीजी बंजारा को जमानत देने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन इसी केस में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें डीजी बंजारा को जमानत देना पड़ा था। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने सह आरोपी राजकुमार पांडियन और बी आर चौबे को जमानत दे दी थी।

जस्टिस थिप्से ने कहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए इन्हें जमानत तो दे दी, लेकिन अपने फैसले में लिखा था कि प्रथम द्रष्टया आरोपी के खिलाफ केस बनता है लेकिन निचली अदालत ने उस पर ध्यान नहीं दिया था। जस्टिस थिप्से ने सोहराबुद्दीन केस में इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि अधिकांश आरोपियों ने बेल पिटीशन डालने के बाद कोर्ट में तत्परता नहीं दिखाई, वो उस पर इंतजार करते रहे जबकि 99 फीसदी केसों में ऐसा नहीं होता है। उन्होंने कहा कि बेल पिटीशन का पेंडिंग होना भी संदेह पैदा करता है।

 

 

 

 

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