पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है, सच कहा था खलील जिब्रान ने पहाड़, प्यार और ज़िन्दगी का ख़्याल

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किताबों में तो बहुत कुछ लिखा होता है कुछ किस्से होते हैं कुछ कहानियां लेकिन रूह को जो छू जाता है वो हैं तर्जुबे, कुछ गा लिया कुछ गुनगुना लिया लेकिन जो ज़ेहन में रह गया उसमें कुछ तो बात होगी। लेबनान के एक शायर हुए हैं खलील जिब्रान जिन्होंने बहुत कुछ कह लिख छोड़ा है जिसे बेशक पढ़ा और उससे भी ज़रूरी है समझा जाना चाहिए- उनकी कुछ लाइने हैं जो इंग्लिश में लिखी गई हैं लेकिन मैं उसकी हिंदी कुछ इस तरह से समझती हूं…

ज़िन्दगी

”घुमिए (ट्रैवल) पर किसी को मत बताइए, सच्चा इश़्क कीजिए पर वो भी किसी को मत बताइए, ज़िन्दगी को ख़ुशी से गुज़ारिए और इसकी इज़हार भी किसी से मत करिए क्योंकि ख़ूबसूरत चीज़ों को लोग बर्बाद कर देते हैं”

ये लाइनें मुझे बेहद पंसद है और उसकी वजह है मेरी ज़िन्दगी को समझने की ज़िद्द (शौकिया तौर पर) इस ख्वाहिश को लिए मैं कोशिश करती हूं कि बचपन में एटलस में जो बेहद छोटे लाल, हरे और काले डॉट के रूप में शहर, राजधानी और जगहों को रटा करती थी उन्हें हकीकत में देख सकूं, घूम सकूं और महसूस कर सकूं।

कभी दोस्तों के साथ तो कभी तन्हा मैं सड़कों पर लगे मील के पत्थरों पर बैठने की कोशिश करती हूं, पहाड़ों पर छिटक कर कभी ऊपर तो कभी नीचे जाती पगडंडियों को पकड़ती हूं, तंग गलियों से झांकती नज़रों को पढ़ने की कोशिश और हंसी में छुपी खुशी में शामिल होने की तमन्ना लिए बग़ैर बुलाए गुलों की महफ़िल में जा पहुंचती हूं और दिल को खुश रखने के लिए ग़ालिब- ओ- मीर के आशार पढ़ती हूं।

चंद रोज़ पहले ऑफिस की चिकचिक और ज़िन्दगी की किचकिच ने दिमाग़ में कुछ जमा दिया था, जिसे कम करने के लिए इधर कई दिनों से दवाइयां भी खानी पड़ रही थी। सोचा इन सब से बचने के लिए पहाड़ों पर चली जाऊं। मैं अक्सर उन जगहों पर जाती हूं जो टूरिस्ट प्लेस नहीं होते बस यूं ही कहीं भी निकल जाना ज़्यादा रोमांचक लगता है।

दिल्ली की उमस भरी गर्मी से दूर बारिश में कोहरे के बीच अचानक ही मुझे लगा कि हॉलीवुड की किसी साइंस फिंक्शन फ़िल्म का सेट लगा हो क़रीब 18 सौ फ़ीट की ऊंचाई पर जाकर वादी में उतरता एक रास्ता जिसे चलते हुए मैं बहुत हल्का महसूस कर रही थी घने देवदार के जंगल के बीच से गुज़रते रास्ते पर चलते हुए हवा में घुला जादुई सुकून मेरी रूह में उतर रहा था और ऐसा महसूस हो रहा था कि दिमाग़ में जो टेंशन भरी थी वो पिघल रही हो, यक़ीन मानिए मुझे इस जगह से प्यार हो गया।

मैंने झट से अपना मोबाइल निकाला और तस्वीरें क्लिक करनी शुरू कर दी पर देखा तो जो ख़ूबसूरत मंज़र मेरी आंखों के सामने था उसका तिनका भी मेरा कैमरा रिकॉर्ड नहीं कर पाया। शायद ये जादू था, सच में जादू ही तो था कुदरती जादू, जिसने देवदार के पेड़ों को ऐसे सजाया था कि वो वादी की तलहटी में होने के बावजूद ऐसे लग रहे थे कि पहाड़ों से गले मिल रहे हों।

बादलों के बीच छुपी हुई वादी जिससे नीचे उतरते वक़्त काई ने कहीं हल्का तो गहरा हरे रंग का एक कालीन बिछाया था जिसमें जगह जगह छिटके गुलाबी और पीले फूल कालीन में करीने से सेट किया हुआ कोई डिजाइन लग रहा था। मैं उस मंज़र में खो गई थी इतना की ख़ुद को भी भूल चुकी थी एक पल के लिए लगा कि मैं कोई इंसान नहीं बल्कि कुदरत की इस ख़ूबसूरत वादी का ही हिस्सा हूं।

मैं उस हवा में उस मंज़र में बिल्कुल घुल मिल गई थी, जाने कहां से एक पुराना गाना भी मेरी ज़ुबां पर आ गया और मैं गाने लगी ”पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बरेसा है, सुरमई उजाला है चंपई अंधेरा है” मैं कुछ क़दम ही आगे बढ़ी की फिर से ख़ुद से बतियाने लगी और कहने लगी क्यों ना जज़्ब हो जाएं इस हंसी नज़ारे में? मुझे वापस लौटना था और लौटते वक़्त बारिश इतनी तेज़ थी कि मेरी गाड़ी या तो खाई में गिर सकती था या फिर लैंडस्टाइल का शिकार इन सबके बीच बस यही सोच रही थी कि ऐसी मुश्किल जगह पर ये लोग क्यों रहते हैं?

और एक बार फिर से मेरी गाड़ी रुकी दो पहाड़ों के बीच में एक छोटे समतल मैदान पर चंद दुकानें और एक एटीएम इस जगह की ख़ासियत थी। बरसते बादलों के बीच दो पहाड़ और सामने वादी, मामूली सी चाय की दुकान की चाय ने वो ख़ुशी दी जो मुझे शायद फ़ाइव स्टार होटल की लज़ीज़ डिश में भी नहीं मिली थी। ख़ैर इस रोमांचक सफ़र के बाद मैं वापस दिल्ली आ चुकी थी मेरी वापसी के बाद पहाड़ों पर बारिश की तस्वीरें मुझे डरा रही थीं जिन रास्तों से होकर मैं गुज़री थी वो या तो लैंडस्लाइट की वजह से बंद हो चुके थे या फिर वो दरिया में तब्दील हो चुके थे।

चूंकी में अभी लौटी थी तो टीवी पर चल रही इन तस्वीरों को क़रीब से देखने के लिए आगे बढ़ गई कि तभी किसी ने पूछा कहां घूमने गई थीं? ये बात सुनकर मैं लॉस्ट (lost) हो चुकी थी मेरी आंखों के सामने वही ख़ूबसूरत मंज़र तैरने लगा और ज़ेहन में खलील जिब्रान की लाइनें ग़ूजने लगी। जिस जगह मैं गई थी उससे मुझे इश्क़ हो गया था मैं वहां बेहद ख़ुश थी और मैं उस जगह के बारे में किसी को नहीं बताना चाहती थी क्योंकि बताने का नतीजा क्या होता है मेरी आंखों के सामने था पहाड़ दरक रहे थे और वादियां नदी के कटान में गुम हो रही थीं। जिसे मेरे हैशटैग और सेव लाइफ़ भी बचाने में नाकाम थे।

(लेखक पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

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