“माना की इस बार गुलाल चुनावी मौसम के बीच उड़ेगा पर हम अपने बच्चों को इस होली किसे गले लगाना है और किससे नज़रे फेर लेनी है ये सिखाएं?”

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ना मासूमियत दिखी और ना बचपना, ना दोस्ती दिखी और ना वो जज़्बा जो सबकुछ भूलाकर बस मुस्कुराना सिखाता है। बदलते माहौल में ये शेर याद आ गया-

ज़ाहिद-ए-तंग नज़र ने मुझे क़ाफ़िर जाना
और क़ाफ़िर ये समझता है मुसलमान हूं मैं

ज़ाहिद-ए-तंग नज़र का इंग्लिश में मतलब होता है narrow minded devout व़ाकई हमारी नज़रों ने हमें तंग दिल बना दिया? एक विज्ञापन में बच्चों की दोस्ती में जिस गंगा-जमुनी तहज़ीब को दिखाने की कोशिश की गई, उसके कई मतलब निकाले जा रहे हैं। विरोध हो रहा हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। वैसे विरोध की कई वजह हो सकती हैं पर इस बार जो वजह है उसपर हंसी आ रही है।

माना की इस बार गुलाल चुनावी मौसम के बीच उड़ेगा पर इसका मतलब ये तो नहीं कि हम अपने बच्चों को इस होली किसे गले लगाना है और किससे नज़रे फेर लेनी है ये सिखाएं? हर बार होली पर रंगों से जुड़ी गंगा जमुनी रवायतों को याद करना भी एक रवायत बन गई है पर क्या इसबार होली ने चुनावों के बीच आकर ग़लती कर दी जो हम विरोध के नाम पर उसमें नफ़रत के रंग भरने की कोशिश कर रहे हैं?

इतिहास का छात्र होने का सबसे बड़ा फ़ायदा ये होता है कि आप मौजूदा दौर को इतिहास के उन पन्नों से तौल सकते हैं जिनके लिए उन्हें संजोया जाता है। बात अगर होली की है तो हमें सिर्फ़ एक विज्ञापन को देखकर दुश्मनी की तलवारें नहीं खींचनी चाहिए, बल्कि अपने इतिहास के उन सुनहरे पन्नों पर भी एक नज़र दौड़ानी चाहिए जो तोड़ना नहीं जोड़ना सिखाती है।

700 साल पहले अमीर ख़ुसरो ने अपनी कुछ हर्फ़ों में ऐसा रंग भरा था जो आज भी गुनगुनाया जाता है-

आज रंग है, हे मां रंग है री
मोरे महबूब के घर रंग है री

वैसे मौजूदा दौर में कई बार विरोध करने वालों को पता नहीं होता कि आख़िर वो विरोध कर क्यों रहे हैं और इसकी बुनियादी वजह है इल्म की कमी। होली कऱीब है और जो विरोध कर रहे हैं उन्हें बीबीसी पर छपे राना सफ़वी के इस ऑर्टिकल को समय निकाल कर ज़रूर पढ़ना चाहिए। इस ऑर्टिकल में बहुत ही ख़ूबसूरती से रंगों के त्योहार में घुली हमारी संस्कृति को पिरोया गया है जिसे मौजूदा दौर में समझने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, क्योंकि बदलते माहौल में घुली नफ़रत ग़ैर मज़हबी दोस्तों को दूर कर रही है।

वैसे इस विज्ञापन को देखकर एक बात और समझ आई कि इसमें बच्चों को ही क्यों लिया गया? क्योंकि इंसान का नाता किसी भी मज़हब से हो बचपन उसका उन्हीं के बीच गुज़रता है जिनसे उनका लगाव हो जाता है और शायद ये बात हम बड़ों की समझ में कभी नहीं आएगी, क्योंकि हमने तो ख़ुद के अन्दर के बच्चे को कब का मार दिया है और अब आमादा हैं इंसानियत को भी ख़त्म करने पर।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘जनता का रिपोर्टर’ उत्तरदायी नहीं है।)

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