”पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है, कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या”

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बल्लीमारान के मोहल्ले की वो पेचीदा दलीलों की सी गलियां
सामने टाल की नुक्कड़ पे बटेरों के क़सीदे

गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वाह वाह

चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे

एक बकरी के मिम्याने की आवाज़

और धुंधलाई हुई शाम बे नूर अंधेरे साए

ऐसे दीवारों से मुंह जोड़ कर चलते हैं यहां

चूड़ी वालान के कटरे की बड़ी बी जैसे

अपनी बुझती हुई आंखों से दरवाज़े टटोले

इसी बेनूर अंधेरी सी गली क़ासिम से

एक तरबीत चराग़ों की शुरू होती है

एक क़ुरआन-ए-सुखन का सफ़हा खुलता है

असदुल्लाह ख़ां-ग़ालिब का पता मिलता है

बेशक, ग़ालिब का पता मिला, गली क़ासिमजान का वो नुक्कड़ भी दिखा जिससे छिटककर एक राह ग़ालिब की हवेली की ओर मुड़ रही थी, कोयले की टाल तो गुम हो गई, चूड़ीवालान में शायद आपके ज़माने की वो रौनक नहीं, पर बड़ी बारादरी से होकर गुज़र रही गली में हर चार क़दम पर चाय की चुस्कियों के साथ कोई गप ज़रूर चल रही थी। बल्लीमारान में शेर-ओ-शायरी का वो दौर तो नहीं रहा लेकिन सियासत पर फ़ब्तियां ज़रूर कसी जा रही थीं। ग़ालिब का ये मोहल्ला दिल्ली में ज़रूर है लेकिन ख़ुद में एक अलग ही दुनिया है, यहां के लोगों की बातचीत कंटेंट से भरी पड़ी है।

ग़ालिब की यौम-ए-पैदाइश ( Birthday) पर मैं गली क़ासिमजान गई थी लेकिन कोरोना की वजह से हवेली पर मार्च से ही ताला लगा है। गर्द की मोटी चादर हर तरफ़ पसरी थी। हवेली के उस आधे हिस्से के आधे दरवाज़े पर ताला लगा था जिसे कहने वाले ग़ालिब की हवेली कहते हैं।

यहीं ग़ालिब ने अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी बरस गुज़ारे और उर्दू अदब को बेशक़ीमती ख़ज़ाने से मालामाल कर गए। मैं अक्सर यहां आती रहती हूं, इस हवेली की दरो-दीवार में कोई फ़र्क नहीं आता अगर कुछ बदलता है तो ग़ालिब की हवेली के ठीक सामने लगे ठेले पर बिगने वाले फल। सन 80 से यहां ठेला लगा रहे बकौल फारूक़ ”हम मौसम के हिसाब से यहां फल बेचते हैं

सेब के सीज़न के सेब
संतरे के सीज़न में संतरा
किन्नू के सीज़न में किन्नू
अमरूद के सीज़न में अमरूद
तरबूज़ के सीज़न में तरबूज़
और फिर रुक कर बोले
आम के सीज़न में आम” और ये कहते हुए उन्होंने एक ठहाका लगा दिया। हर कोई जानता है मिर्ज़ा ग़ालिब आम के कितने शौक़ीन थे । मैंने पूछा ”अगर ग़ालिब ज़िन्दा होते तो आप अपने ठेले पर क्या बेचते” ? तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा ”ग़ालिब साहब होते तो जाने हम क्या बेचते, क्या पता”? ग़ालिब ना होकर भी हर जगह मौजूद थे। मैं चूड़ीवालन की तरफ़ बढ़ी तो आगरा से आए रमेशचंद से मुलाक़त हो गई वो पिछली पांच पीढ़ियों से यहां चूड़ियों का व्यापार कर रहे हैं। आजकल उनका धंधा कुछ मंदा चल रहा है लेकिन फिर भी ख़ुश हैं। जब मैंने उनसे ग़ालिब के बारे में पूछा तो पुरानी पहचान जताते हुए कहने लगे ”वैसे आदमी बढ़िया है, बहुत दूर-दूर से लोग आते हैं उनकी हवेली देखने”। रमेशचंद की बातों में ग़ालिब की पहचान सुनकर मुझे ग़ालिब का वो शेर याद आ गया।

होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को ना जाने
शायर तो वो अच्छा है पर बदनाम बहुत है

नाम और बदनामी का तो पता नहीं लेकिन ग़ालिब की गली में भी आजकल वही चर्चा आम है जिसका ज़िक्र तमाम दुनिया में हो रहा है। मैं गली क़ासिमजान में दाख़िल हुई, तो मोड़ पर बनीं मस्ज़िद की पायदान पर बैठे शख़्स के हाथ में उस अख़बार पर नज़र पड़ी जिसमें एक मोटी हेडलाइन लिखी थी- ”ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर बढ़ रहा ट्रैक्टर-ट्रॉलियों का जमावड़ा” बकरियों के लिए चारा बेचने वाला ये शख़्स किसान आंदोलन से जुड़ी उस ख़बर को पढ़ रहा था जिसने दिल्ली की सियासत में कुछ हलचल पैदा कर दी है। मैं उस ख़बर को पढ़ते हुए आगे बढ़ गई लेकिन ग़ालिब की गली में इस ख़बर को पढ़कर मेरे ज़ेहन में एक ख़्याल आया कि अगर ग़ालिब आज मौजूद होते तो इस दौर में ऐसी सियासत और हालात पर क्या कुछ बोलते? हालांकि वो जो कुछ भी बोल गए हैं वो आज बहुत रिलेवेंट लग रहा है, जैसे इतिहास ख़ुद को दोहरा रहा हो। और इसकी मिसाल है सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वो तमाम छोटे-छोटे क्लिप जो गुलज़ार के बनाये हुए सीरियल ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ का हिस्सा हैं। ऐसी ही एक क्लिप मैं मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली के दरवाज़े पर खड़ी होकर देखने लगी।

”कैसे कम्पनी-बहादुर आए हैं कहीं कोई शहर बिक रहा है, कहीं रियासत बिक रही है, कहीं फौज़ियों की टुकड़ियां बेची जा रही हैं, ख़रीदी जा रही हैं, ये कैसे सौदागर आए हैं इस मुल्क़ में, सारा मुल्क़ पनसारी की दुकान बन गया है, मालूम ना था कि इतना सब है घर में बेचने के लिए ज़मीन से लेकर ज़मीर तक सब बिक रहा है, सब बिकता जा रहा है”

बदलते कैंलेंडर में सदियां दफ़्न हो गईं लेकिन ये वक़्त देखकर लग रहा है क्या कुछ बदला ? क्या हम आगे की ओर जा रहे हैं या फिर गुज़रा दौर लौट रहा है। ग़ालिब ने इसी दिल्ली में रहते हुए अगर मुग़ल सल्तनत का डूबता सूरज और अंग्रेज़ी हुक़ूमत का उरूज देखा तो हमने भी यहीं रहते हुए अच्छे दिन के वादे में लिपटे बुरे दौर को समझ लिया। सियासतदानों ने हमसे अच्छे दिनों का वादा किया था और अब हम ग़ालिब का शेर दोहरा रहे हैं।

तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान, झूठ जाना
कि ख़ुशी से मर ना जाते, अगर ऐतबार होता

ग़ालिब ने इसी दिल्ली में चार महीने तक चले 1857 के ग़दर को फ़ारसी में अपनी किताब ‘दस्तंबू’ में उतारा, अपने क़रीबियों और अजीज़ों की मौत की ख़बर सुन कर मायूसी में दिन काटे और देखिए बीते साल इसी दिल्ली में हमने भी दंगों की तपशी को सहा, अपने क़रीबियों और दोस्तों की कांपती आवाज़ में क़रीब आती मौत को महसूस किया। आख़िर आप ही बताएं कि इस दिल्ली में क्या बदल गया? वतन की बदली फ़िज़ा में हमने बहुत से लोगों को दिल्ली ही नहीं बल्कि वतन छोड़कर जाने की बात सुनी। आपसे भी तो आपकी बेग़म ने दिल्ली छोड़कर जाने की इल्ताज़ की थी और आपने उन्हें टालते हुए कहा था

बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

लेकिन ना आपने दिल्ली से मुंह मोड़ा और ना हम टस से मस हो रहे हैं। क्योंकि इस शहर में कुछ तो ऐसा है जो इसे छोड़कर जाने की इजाज़त नहीं देता। ऐसा नहीं है कि ये दिल्ली हमेशा से ही ऐसी थी और फिर आप तो उस गंगा-जमुनी तहज़ीब के गवाह रहे हैं जो इस शहर की पहचान है, इसी ख़ूबसूरत पहचान पर मुझे वो वाक़्या याद आता है जब दिवाली पर किसी ने आपके यहां मिठाई भेजी और आपको किसी ने टोकते हुए पूछा

मिर्ज़ा, दिवाली की मिठाई खाएंगे आप?
मिर्ज़ा ग़ालिब- जी, बर्फी है आप खाएंगे ?
मुसलमान होकर ?
मिर्ज़ा ग़ालिब- और बर्फी हिन्दू है क्या?
और क्या, मुसलमान है, शिया है सुन्नी है
मिर्ज़ा ग़ालिब- और जलेबी? वो किस ज़ात की है? खत्री है, या शिया, या सुन्नी?

ग़ालिब की बातों में ही नहीं बल्कि उनकी शायरी में भी कुछ ऐसा ही अंदाज़ दिखता है।

देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल को ख़ुश रहने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है

कमाल का एटिटूड, लाजवाब ह्यूमर और फ़क़ीर मिजाज़ के ग़ालिब के क़िस्से आज भी गली क़ासिमजान में गूंजा करते हैं और ऐसा ही एक और क़िस्सा मुझे सुनाया बड़ी बारादरी में अंदर घुसते ही ढोलक की दुकान पर बैठने वाले एक शख़्स ने। वो बताते हैं कि उनका बचपन इन्हीं गलियों में ग़ालिब के क़िस्से सुनते हुए गुज़रा है ”हमने सुना था कि जब ग़ालिब लाल क़िले में लगने वाले दरबार में अपना शेर पढ़कर बाहर निकलते थे तो उसकी गूंज चावड़ी बाज़ार तक सुनाई देती थी जब वो निकल रहे होते थे तो लोग उनका शेर पढ़ रहे होते थे”

ग़ालिब ने अपनी पूरी ज़िन्दगी वज़ीफ़ों और पेंशन के चक्कर लगाते हुए काट दी लेकिन आज उनके नाम के शेर पढ़ने वालों की चांदी है, सोशल मीडिया से लेकर संसद तक ग़ालिब के शेरों को कोट किया जाता है, जिन शेरों को ग़ालिब ने मुफ़लिसी के दिनों में काग़ज़ पर उतारा आज उन्हीं की रॉयलटी किसी का बैंक बैलेंस बढ़ा रहे हैं। फ़ारसी पसंद करने वाले ग़ालिब के उर्दू शेरों ने उन्हें मक़बूलियत अता की, लेकिन ग़ालिब के काम को नज़दीक से देखने और समझने वाले बताते हैं कि गालिब का असली ख़ज़ाना उनके ख़तों में छुपा है। आज भले ही ख़तों की जगह व्हाट्सऐप ने ले ली हो पर ग़ालिब के वो ख़त जो उन्होंने अपने दोस्त मुंशी हरगोपाल तफ़्ता, नबी बख़्श हक़ीर, चौधरी ग़फूर सुरूर, नवाब लोहारू जैसे तमाम लोगों को लिखे थे अदब की दुनिया से जुड़े लोगों के लिए बहुत ख़ास हैं। ग़ालिब को समझने वाले मज़हब और मुल्क़ की सरहदों से ऊपर हैं। उनके चाहने वाले उन्हें चच्चा ग़ालिब यूं नहीं कहते उनसे नाता जोड़ लेने वालों में कल की पीढ़ी भी थी और आज के मिलेनियल (Millennial) भी शामिल हैं।

ग़ालिब के चाहने वाले उनके लिए मुशायरों के साथ ही बड़े इवेंट करते हैं, तो आज के बच्चों के लिए ग़ालिब के शेर स्वैग का हिस्सा बन गए हैं जिन्हें वो अपनी DP के साथ पर्सलैंटिसी को बयां करने में इस्तेमाल करते हैं। भले ही ग़ालिब के शेरों के गहरे मायने हों लेकिन वो आज भी बोलचाल में ख़ूब शामिल किए जाते हैं । जैसे हमारे घर के 11 से 20 साल के बच्चे ही अक्सर ग़ालिब के शेरों को बातचीत में इस्तेमाल करते हैं झगड़े में एक दूसरे से तू-तू मैं-मैं हो जाने पर जब हम टोकते हैं कि ये बात करने का क्या तरीक़ा है तो कहते हैं कि

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

और जब हम कहते हैं आख़िर इतना इगो किस लिए आख़िर तुम हो क्या तो जवाब मिलता है

पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है 
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या 
वैसे तो शायर बहुत हैं लेकिन मेरे लिए ग़ालिब वाहिद ऐसे शायर हैं जिन्हें समझ लेने के लिए एक उम्र तो कम पड़ेगी।
हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

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