“अगर कन्हैया हार जाएं तो मुझे हैरानी नहीं होगी क्योंकि जिस देश में 16 साल संघर्ष करने वाली शर्मिला इरोम का शुक्रिया 90 वोट से किया गया हो तो फिर कन्हैया क्या चीज़ हैं?”

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पेड़ों से पुराने पत्ते गिर रहे हैं और शाखाओं पर नए पत्ते एडजस्ट होने की जद्दोजहद कर रहे हैं। क़ायनात का निज़ाम बहुत ही ख़ामोशी से उस फ़ॉर्मूले पर चल रहा है जिसे हम बदलाव कहते हैं। इत्तेफ़ाक से ये वक़्त हमारे देश में चुनावी मौसम का भी है और इसी मौसम की बात जवाहरलाल नेहरू विश्ववविद्यालय से निकले कन्हैया कुमार दिल्ली से क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर बेगूसराय में अपने गांव में कर रहे हैं।

Photo: @kanhaiyakumar

पसीने में लतपत कन्हैया हाथ में ढप लिया गा रहे हैं। धीरे धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है। वाकई देश की फ़िज़ा में चुनावी रंग अच्छे से घुल गया है, हर संभव तरीक़े से प्रचार किया जा रहा है। वोटर को रिझाने के लिए हर जगह घुसपैठ की जा रही है। क्रिएटिविटी के सूरमों की अग्निपरीक्षा की घड़ी है। कुछ लोगों ने आसमान से लेकर मोबाइल तक और टीवी सीरियल से लेकर न्यूज़ चैनल तक हाईजैक कर लिए हैं।

ऐसे में हाथ में ढप लिए अपने ही प्रचार में निकले कन्हैया गा रहे हैं, ”बातें बहुत हो चुकी हैं मेरे तुम्हारे विषय में हर एक सच कल्पना से आगे निकलने लगा है।” बेहद साधरण लेकिन सच्चे शब्द लगते हैं, झाल मंजिरा की ये मंडली कितने लोगों तक अपनी बात पहुंच पाएगी… क्या पता? क्या प्रचार ही जीत दिला देते हैं? इस चुनाव में ये बड़ा सवाल है, क्योंकि इस चुनावी लड़ाई में जितना पैसा प्रचार पर लगा दिया गया है उसका तिहाई भी अगर देश के स्कूल और अस्पताल पर खर्च होता तो तस्वीर कुछ और होती?

इसमें कोई दो राय नहीं कि बाक़ी लोगों के प्रचार के सामने कन्हैया का प्रचार फीका है, और शायद यही फीकापन उसकी ख़ासियत है। मुझे आज भी 2016 की वो रात याद है जब कन्हैया जेल से छूटकर बहुत ही गुपचुप तरीक़े से JNU के एड ब्लाक पहुंचे थे। मैं उस वक़्त वहीं थी, कोई कह रहा था “वो कुछ नहीं बोलेगा डर गया होगा”, तो किसी ने कहा था कि ”देखना नेता बनकर निकलेगा जेल से….”। आज वही बात याद आ रही है, कन्हैया नेता बन चुके हैं, और उस जगह से चुनाव लड़ रहे हैं जहां उनकी पार्टी को जीत का मुंह देखे सदियों की तरह साल हो गए हैं।

उनके मुक़ाबिल BJP ने अपने तोप नेता गिरिराज सिंह को उतारा है। चुनावी पंडित कुछ भी कहें कन्हैया ख़ुद भी मान रहे हैं कि बेगूसराय में मुक़ाबला उनके और BJP के ही बीच है। अगर कन्हैया हार जाएं तो मुझे बिल्कुल भी हैरानी नहीं होगी क्योंकि जिस देश में 16 साल संघर्ष करने वाली शर्मिला इरोम का शुक्रिया 90 वोट से किया गया हो तो फिर कन्हैया क्या चीज़ हैं? हालांकि एक इंटरव्यू में हार के सवाल पर उनका जवाब था- “क्या फ़र्क़ पड़ता है, जीत मिले या ना मिले”।

एक बार फिर वो गाते हैं- “वातावरण सो रहा था अब आंख मलने लगा है धीरे धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है”।
सच में कन्हैया कि जीत उनकी नहीं बल्कि उन मुद्दों की जीत होगी जिनकी तलाश पिछले पांच साल से की जा रही है, और उनकी हार ये साबित कर देगी कि मेरे प्यारे वतन में चुनावी मुद्दों का क़त्ल कर उन्हें दफ़न कर दिया गया और उनपर बोए गए मंदिर-मस्जिद, हिंदू-मुसलमान, कश्मीर-पाकिस्तान के दरख़्तों से वोट तोड़कर सरकार बनाने का फ़िक्स फ़ॉर्मूला सेट है।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

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