मोदी के इस मंत्री ने जिग्नेश मेवानी का किया खुलकर बचाव, बोले- ‘भीमा-कोरेगांव हिंसा के लिए वह जिम्मेदार नहीं’

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नए साल के पहले दिन महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित भीमा-कोरेगांव में दलित समाज के शौर्य दिवस पर भड़की जातीय हिंसा के मामले में पुलिस की ओर से गुजरात के निर्दलीय विधायक और दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ भड़काऊ भाषण के लिए मामला दर्ज किए जाने के बाद मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने मेवाणी का खुलकर बचाव किया है। अठावले ने कहा है कि एक जनवरी को पुणे जिले के भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के लिए गुजरात का यह विधायक जिम्मेदार नहीं है।

(Indian Express Photo/Shekhar Yadav)

आपको बता दें कि एक जनवरी को पुणे के पास स्थित भीमा-कोरेगांव में दलित समाज के शौर्य दिवस पर भड़की जातीय हिंसा के मामले में पुणे पुलिस द्वारा गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी और दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र नेता उमर खालिद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। दोनों पर हिंसा को भड़काने का आरोप लगाया गया है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलने के बाद शनिवार (6 जनवरी) को पुणे में मीडिया से बातचीत में प्रमुख दलित नेता अठावले ने कहा कि एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव के युद्ध के 200 साल पूरे होने से पहले भी इस इलाके में तनाव था। एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव में युद्ध स्मारक में आने वाले दलितों पर हमला हुआ था।

दलित नेताओं ने हमलों के लिए कुछ खास हिन्दुत्ववादी नेताओं को जिम्मेदार ठहराया था। हैरानी की बात यह है कि इन नेताओं ने एक दिन पहले दिए गए मेवाणी की भड़काऊ भाषण को जिम्मेदार ठहराया। केन्द्रीय सामाजिक न्याय राज्यमंत्री अठावले ने कहा कि, जिग्नेश भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार नहीं है।

उन्होंने कहा कि मैंने इलाके का दौरा किया था और तनाव कम हुआ था। इसलिए मैं 31 दिसंबर को दिल्ली वापस चला गया था। इसी दिन, जिग्नेश ने पुणे में अपना भाषण दिया था। वह भीमा-कोरेगांव नहीं गए थे। कुछ संगठनों ने रात में बैठक की थी और एक जनवरी को हिंसा हुई थी।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, हिंसा की शुरुआत पुणे के कोरेगांव-भीमा से सोमवार (1 जनवरी) को तब शुरू हुई, जब कुछ दलित संगठनों ने 1 जनवरी 1818 में यहां पर ब्रिटिश सेना और पेशवा के बीच हुए युद्ध की 200वीं वर्षगांठ मनाने जुटे थे। भीमा-कोरेगांव में लड़ाई की 200वीं सालगिरह को शौर्य दिवस के रूप में मनाया गया, जिसमें बड़ी तादाद में दलित इकट्ठा हुए थे। इस दौरान कुछ लोगों ने भीमा-कोरेगांव विजय स्तंभ की तरफ जाने वाले लोगों की गाड़ियों पर हमला बोल दिया।

इसके बाद हिंसा भड़क गई जिसमें कथित तौर पर एक युवक की मौत हो गई। हालांकि गृह राज्य मंत्री (ग्रामीण) दीपक केसरकर ने बुधवार को कहा कि दलित समाज से किसी की जान नहीं गई है। दरअसल कोरेगांव भीमा में 1 जनवरी 1818 को पेशवा बाजीराव पर ब्रिटिश सैनिकों की जीत की 200वीं सालगिरह मनाई जा रही थी। इतिहासकारों के मुताबिक 1 जनवरी 1818 को भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों की सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की 28,000 सैनिकों को हराया था।

दलित नेता इस ब्रिटिश जीत का जश्न मनाते हैं। दलित नेता ब्रिटिश फौज की इस जीत का जश्न इसलिए मनाते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जीतने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़ी टुकड़ी में ज्यादातर महार समुदाय के लोग थे, जिन्हें अछूत माना जाता था। इसे कोरेगांव की लड़ाई भी कहा जाता है। दलित समुदाय इस युद्ध को ब्रह्माणवादी सत्ता के खिलाफ जंग मानता है। एक जनवरी को पुणे में कुछ दक्षिणपंथी समूहों ने इस ‘ब्रिटिश जीत’ का जश्न मनाए जाने का विरोध किया था। जिसके बाद यह समारोह हिंसा में तब्दील हो गई।

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