शोध में उजागर हुआ, गरीब, अल्पसंख्यक और दलित परिवारों की पृष्ठभूमि के कैदियों को ही मिली सर्वाधिक मौत की सजा

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दिल्ली विश्वविद्यालय के कानून विभाग की एक शोधकार्य में पता चला है कि 80 प्रतिशत मौत की सजा मिले कैदियों ने अपनी स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कि होती है। जिन कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई है उनमें से अधिकांशत गरीब, अल्पसंख्यक और दलित परिवारों की पृष्ठभूमि से है और ये सब कैदी 18 की आयु से पहले ही इन लोगों ने रोजगार के लिये काम शुरू कर दिया था।

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दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून विषय के शोधकर्ताओं ने अपने डेथ पेनल्टिी रिसर्च प्रोजेक्ट के अर्तगत् पाया कि भारत में मौत की सजा काट रहे कैदियों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, वे सभी पिछले समुदायों और अल्पसंख्यक समाज से है। इनमें से जिन कैदियों ने गम्भीर अपराधों को अंजाम दिया उनकी उम्र 18 से 21 वर्ष के बीच रही है। दलित और आदिवासी समाज में से 24.5 प्रतिशत लोग ;90 कैदीद्ध आते है जबकि अन्य अल्पसंख्यक समुदाय से 20 प्रतिशत ;76 कैदीद्ध आते है।

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दो भागों में प्रकाशित इस रिपोर्ट का अध्ययन जुलाई 2013 से जनवरी 2015 के बीच किया गया। शुक्रवार को रिपोर्ट जारी करने के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मदन बी लोकुर ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया के ढांचे में आज हमें ठोस सुधारों की आवश्यकता है, जिससे की कानून केवल एक मजाक बनकर नहीं रह जाना चाहिए बल्कि ऐसे अपराधों में सुधार की एक वजह भी होना चाहिए।

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(Source: Indian Express)

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