#MeToo: “मेरी जैसी डेस्क (न्यूज चैनल) पर काम करने वाली तमाम लड़कियां बहुत आसानी से बता सकती हैं कि डिग्री पर ख़ूबसूरती कैसे और क्यों भारी पड़ती है”

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दुनिया में लड़कियों ख़ासकर बच्चियों के साथ जब भी कुछ बुरा होता है तो मैंने अक्सर अपने आस-पास के बुर्ज़ुर्गों को यही कहते सुना है कि बेटियां तो सबकी सांझी होती हैं। ना वो हिंदू की होती हैं ना मुसलमान की… ना ही वो ग़रीब की होती हैं ना अमीर की, वो तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने नसीब की होती हैं। ये सुनकर मैं भी सवाल करती हूं तो फिर क्या उन्हें उनके नसीब पर छोड़ दिया जाए?

#MeToo
PHOTO: AFP

दुनिया भर में घूम घाम के भारत आए #MeToo नाम के कैंपेन ने अच्छी खासी खलबली मचाई हुई है (सिर्फ़ सोशल मी़डिया पर) बात तनुश्री दत्ता से शुरू हुई और मीडिया तक पहुंच गई। मेरे लिए मीडिया में आए इस नए शगल पर बात करना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि मैं ख़ुद भी लंबे समय से इसी जहान में हूं। मेरी डेज़िग्नेशन और सैलरी (इंक्रिमेंट) भले ही नौकरी में गुज़ारे साल से कम बढ़ी हो लेकिन मीडिया की नसों में दौड़ने वाली सोच से मैं बहुत अच्छे से वाक़िफ़ हूं।

चैनल में आई इंटर्न से लेकर टॉप मोस्ट एंकर तक के लिए कैसी सोच है ये आपको चैनल के गेट पर बैठने वाला गार्ड बहुत अच्छे से बता देगा। मेरी जैसी डेस्क पर काम करने वाली तमाम लड़कियां बहुत आसानी से बता सकती हैं कि डिग्री पर ख़ूबसूरती कैसे और क्यों भारी पड़ती है। कैसे एक साधारण सी दिखने वाली लड़की की क़ाबलियत ख़ूबसूरत दिखने वाली लड़की से कम हो जाती है और साथ ही एक ख़ूबसूरत लड़की की क़ाबलियत से ज़्यादा उसके रंग रूप पर बात की जाती है।

मैं जानती हूं और इस बात को दिल से मानती भी हूं की दीपक तले सबसे ज़्यादा अंधेरा होता है, एक शो, एक डिबेट, एक असाइनमेंट के मिलने पर किसी लड़की के बारे में कैसी बातें होती हैं ये सिर्फ़ इसी जगह काम करने वाले जानते हैं। आपके साथ चैनल के बाहर चाय की दुकान पर दुनिया जहान के मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा में हिस्सा लेने वाले आपके पलटते ही कैसे ओछी मुस्कुराहट के साथ आपका कैरेक्टर असैसिनेशन करते हैं वो पास खड़ी मुझ सी लड़कियों ने कई बार देखा होगा।

प्रतीकात्मक तस्वीर: गूगल

पत्रकारिता में दुनिया बदल देने की तमन्ना लिए आई लड़कियां गुज़रते सालों के साथ ख़ुद बदल जाती हैं। हिप्पोक्रेसी का असली मतलब तो मैंने यहीं आकर समझा, कुछ देर पहले जो स्क्रीन पर लड़कियों की लड़ाई लड़ रहा था वो चाय कि दुकान पर सिगरेट के छल्लों के साथ लड़कियों के बारे में क्या बातें करता है ये किसी दिन चुपके से नोएडा फ़िल्म सिटी के पवन की चाय की दुकान पर 10 मिनट खड़े होकर ज़रूर सुनिएगा।

लड़कियों को हक़ मिले, इंसाफ़ मिले, वफ़ादारी मिले, अच्छी दुनिया मिले ये किसी भी चैनल में उस तरह की बात है जैसे भगत सिंह पैदा होने चाहिए पर पड़ोसी के घर में। सोशल मीडिया पर तैर रहे #MeToo कैंपेन को लाइक, शेयर और कमेंट करने वाले कितने ऐसे ईमानदार मीडिया वाले होंगे जो दिल पर हाथ रखकर कह सकते हों कि हां मैने अपने साथ काम करने वाली लड़की का चाहे अनचाहे में शोषण नहीं किया।

साहब, शोषण की जद्द में रेप ही नहीं आता इसमें ज़ुबान से लेकर ज़ेहन तक की सोच शामिल है। इंग्लिश वाले तो फिर भी बोल रहे हैं बेचारी हिंदी मीडिया से जुड़ी लड़कियों का हाल तो और ख़राब है। यक़ीन मानिए यहां जो सबसे महान हैं वो सबसे बड़ा शैतान है। कुल मिलाकर ये किसी गटर से कम नहीं है और यहां कोई किसी पर उंगली नहीं उठा सकता क्योंकि इस हमाम में सब के सब नंगे हैं।

(लेखक टीवी पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘जनता का रिपोर्टर’ उत्तरदायी नहीं है।)

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1 COMMENT

  1. लड़के सोचते हैं लड़कियों को इस फील्ड में आसानी से नौकरी मिल जाती है और लड़कियां सोचती हैं ‘खूबसूरत’ लड़कियों को आसानी से मिल जाती है…शोषण तो दोनों(तीनों) का हुआ जरूरी नही शारीरिक ही हो😢डिग्री सिर्फ इंट्री टिकट ही है इस तमाशे में!

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