मी टू: सुनिए! क्योंकि महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाने से पहले, ये जान लीजिए कि ये जो औरतें अब बोल रही हैं, इन्हें आपकी मदद की ज़रूरत नहीं है

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सोशल मीडिया पर मी टू कैंपेन शुरू होने के बाद से ही एक अजीब सी हलचल है, अजीब छटपटाहट…एक बेचैनी। बहुत लोगों के चेहरे से नकाब उतर रहे हैं। बहुत लोग घबराएं हुए हैं कि अगला नंबर कहीं उनका ना हो। कुछ लोगों को चिंता ये भी है कि ये बाढ़ मासूम, निर्दोष लोगों को भी बहाकर ले जाएगी, लेकिन इन सबसे अलग एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो शुतुरमुर्ग की तरह मिट्टी में मुंह धंसाए बैठा है। जो ये मानने को तैयार ही नहीं कि सैक्सुअल हैरेसमेंट (यौन दुराचार) कोई मुद्दा भी है।

मी टू

ये ‘मासूम’ इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं कि सैक्सुअल हैरेसमेंट वाकई हुआ होता तो ये लड़कियां इतने सालों तक चुप क्यों रहतीं? इनका मानना है कि अगर लड़की यौन प्रताड़ना के वक्त नहीं बोली, नहीं लड़ी, पुलिस के पास नहीं गई, चिल्लाई नहीं, हंगामा नहीं किया, तो मतलब ये है कि- जो हुआ, वो लड़की की सहमति से हुआ। यानी लड़की का चरित्र ठीक नहीं है, यानी उस लड़की की बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

यकीन मानिए ‘मी टू’ जैसे कैंपेन्स की ज़रूरत उन सैक्सुअल ओफेंडर्स से ज़्यादा इन लोगों की वजह से पड़ी है, जो इतने मासूम हैं कि अपने ही सामने हो रहे सैक्सुअल हैरेसमेंट को देख नहीं पाते। सोशल मीडिया पर जो लड़कियां अपनी आपबीती साझा कर रही हैं, उन लड़कियों के प्रोफाइल पर ज़रा गौर कीजिए। इनमें ज़्यादातर वो लड़कियां हैं, जो अपने पैरों पर खड़ी हैं…आर्थिक, भावनात्मक और मानसिक रूप से आत्मनिर्भर हैं।

तमाम दर्द, तकलीफ़, नाराज़गी, गुस्से, आत्म ग्लानि के बावजूद ये आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए उन्हें अपने भीतर कितनी लड़ाइयां लड़नी पड़ी होंगी। ये तो ख़ैर उनके अलावा कोई नहीं समझ सकता, पर आप ये समझने कोशिश कीजिए कि जब ये आत्मनिर्भर लड़कियां इतनी मुश्किल से अपनी आपबीती बता पा रही हैं, तो क्या हाल होगा उन औरतों का जिनकी मेंटल कंडीशनिंग ही ऐसी हुई है कि ग़लत कुछ भी हो… ग़लती हमेशा उनकी रही होगी। या जो हर तरह से अपने ऑफेंडर्स पर आश्रित हैं, या जिनके अपराधी उनके अपने घर में हैं।

ओह! चौंक गए क्या आप? आपकी जानकारी के लिए- आपके देश में हर तीन में से एक औरत 15 साल की उम्र से पहले ही अपने घर में सैक्सुअल असॉल्ट झेल चुकी होती हैं। याद रखिएगा कि ये ‘नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे’ का ऑफीशियल डेटा है। मालूम नहीं कि ये सर्वे करते वक्त कितनी लड़कियां बता पाई होंगी कि उनके अपने पिता ने, या अपने भाई ने उनमें सेक्स ऑब्जेक्ट तलाश करने की कोशिश की, क्योंकि दूसरे को बताना तो दूर, ये सच लड़कियां ख़ुद अपने आप से छुपाने की कोशिश करती हैं।

चलिए इस ऑफीशियल आंकड़े को ही सच मान लेते हैं, तो भी समझ रहे हैं ना आप? यानी आपके घर में अगर तीन औरतें हैं, तो उनमें से कम से कम एक ने यौन दुराचार झेला है…और आप? आप जानते भी नहीं है। कड़वा है, पर सच है कि इस वक्त आप ही के घर में कोई ना कोई सैक्सुअल आफेंडर मौजूद है। आंखों पर पट्टी लगाकर बैठे हैं तो नहीं दिखेगा, पट्टी उठाएंगे तो अपने घर की औरतों-लड़कियों के चेहरे का वो अनजाना तनाव देख पाएंगे।

ये देख पाएंगे कि घर में किसी ‘ख़ास रिश्तेदार’ के आते ही क्यों आपकी बहन का हाथ उसके दुपट्टे की तरफ़ चला जाता है। आपकी बेटी किसी ‘ख़ास अंकल’ को चाय सर्व करने के बजाए क्यों पूरा किचन संभाल लेने की ज़िद करती है? आपकी बेस्ट फ्रेंड अचानक आपके बड़े भाई के सामने आने से क्यों बचने लगी है? ये सब किसी दूसरी दुनिया में नहीं हो रहा है। ये आपकी आंखों के सामने हो रहा है… आपके अपने घर में।

फिर भी आपके घर की ये लड़कियां आपको ये नहीं बता रही हैं। इसलिए नहीं कि उन्हें मदद नहीं चाहिए, या उन्हें रोने के लिए कोई कंधा नहीं चाहिए, या फिर वो अपने अपराधियों को सज़ा नहीं दिलाना चाहतीं, या उसके अंदर ग़ुस्सा, नाराज़गी, घृणा नहीं है। वो आपको इसलिए नहीं बतातीं, क्योंकि उन्हें आप पर भरोसा नहीं हैं…उन्हें भरोसा नहीं है कि आप खुले मन से उनका साथ देंगे।

मी टू, पर सवाल उठाने से पहले, अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर इन महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाने से पहले, ये जान लीजिए कि ये जो औरतें अब बोल रही हैं, इन्हें आपकी मदद की ज़रूरत नहीं है। ये कोई सेवियर, कोई रक्षक नहीं ढ़ूंढ रही हैं। बल्कि आप इनकी तकलीफ़ को समझ सके, बिना जज किए, बिना वजह पूछे सिर्फ उनके दर्द सुन सके, ये सिर्फ इतना चाहती हैं। आप मानें ना मानें, लेकिन इन्हें जो झेलना था, वो झेल चुकी हैं। मानसिक रूप से बहुत हद तक उबर भी चुकी हैं, इसलिए बोलने की हिम्मत भी कर पाई हैं।

लेकिन जब आप ये कहते हैं कि ये लड़कियां ‘तब क्यों नहीं बोलीं’ या आप उनके बोलने के औचित्य, उनके चरित्र पर सवाल उठाने लगते हैं, तो दरअसल आप अपने घर की लड़कियों को कह रहे होते हैं कि अगर तुम्हारे साथ किसी ने कभी ग़लत किया है, या कोई ग़लत कर रहा है, या कल कोई कुछ ग़लत करेगा, तो अपना मुंह बंद रखना! क्योंकि तुमने मुंह खोला, तो हमारे जैसे लोग तुमसे सबूत मांगेंगे, तुम्हारे शरीर, तुम्हारे चरित्र, तुम्हारे अस्तित्व को स्कैन करेंगे और फिर अपने मूड के हिसाब से फैसला करेंगे कि तुम्हारी बात मानी जाए या नहीं।

जिगरा रखिए हुज़ूर! कोई अपना दर्द कह रहा है तो उसे सुनिए…ऑफेंडेड हुए बिना, जजमेंट्स दिए बिना, ताने मारे बिना, ज़हरीली मुस्कान फेंके बिना, ख़ुद को सेवियर और कहने वाले को बेचारा माने बिना…क्योंकि दिल बड़ा नहीं रखेंगे तो दूसरी तो छोड़िए आप अपने घर की लड़कियों का भरोसा भी नहीं जीत पाएंगे। और किसी दिन आपको पता चलेगा कि आपके अपने घर की बेटी ऐसे ही मुश्किल वक्त से गुज़री है (गुज़र रही है)…वो अकेले झेलती रही, अकेले मरती रही, लेकिन आपको नहीं बता पाई, क्योंकि उसे अपने मां-बाप, अपने भाई-बहन, अपने दादा, अपने मामा, या जो भी आपका उससे रिश्ता है, उस पर भरोसा नहीं था…यकीन मानिए, ये बोझ नहीं उठा पाएंगे आप।

(Kanchan Pant is the author of book Bebaak. Views expressed here are her own and Janta Ka Reporter doesn’t endorse them)

 

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