निजामुद्दीन मरकज़ मामले में कौन है असली गुनहगार?, तबलीगी जमात ने प्रशासन ने मांगा था 17 गाड़ियों का कर्फ्यू पास, लेकिन नहीं दिया कोई जवाब

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कोरोना वायरल संकट के बीच धार्मिक कार्यक्रम के कारण सुर्खियों में आई तबलीगी जमात के मुख्यालय मरकज़ निजामुद्दीन ने मंगलवार (31 मार्च) को कहा कि उसने कानून के किसी प्रवधान का उल्लंघन नहीं किया है। उसने अपने परिसर में क्वारन्टीन सेंटर स्थापित करने की भी पेशकश की है। मरकज ने एक बयान में कहा कि वह प्रशासन के साथ पूरा सहयोग करेगा।

निजामुद्दीन

बता दें कि, दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने मंगलवार को कहा कि निजामुद्दीन में तबलीगी मरकज़ में कुछ दिनों पहले आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए 24 लोगों के कोरोना वायरल से संक्रमित होने की पुष्टि हुई है। वहीं, इस जमात में शामिल होने 7 लोगों की मौत हो गई है। जिसमें से 6 तेलंगाना और 1 श्रीनगर का शख्स है। तबलीगी जमात द्वारा विस्तृत प्रतिक्रिया के बाद दिल्ली पुलिस ने निजामुद्दीन को बंद कर दिया, जहां मस्जिद स्थित है और सैकड़ों भक्तों को वहीं छोड़ दिया गया। इसके बाद दिल्ली सरकार ने दिल्ली पुलिस को आदेश दिया कि वह लॉकडाउन का उल्लंघन करने के लिए मरकज़ अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे।

लेकिन, वहीं दूसरी ओर कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिए बरती जा रही सतर्कता के बीच दिल्ली में बड़ी लापरवाही सामने आई है। मरकज़ की ओर से इस पूरे मामले पर अब जो बयान जारी हुआ है वो दिल्ली पुलिस और प्रशासन को ही कठघरे में खड़ा करता है। मरकज़ का कहना है कि 24 मार्च से लगातार हम पुलिस और प्रशासन के संपर्क में हैं। मरकज़ से लोगों को बाहर निकालने के लिए कर्फ्यू पास की मांग कर रहे थे।

तबलीगी जमात मरकज़ का पूरा बयान:

तबलीगी जमात 100 साल से पुरानी संस्था है जिसका अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय दिल्ली की बस्ती निज़ामुद्दीन में है। यहां देश और विदेश से लोग लगातार सालों भर आते रहते है। ये सिलसिला लगातार चलता है जिसमें लोग दो दिन, पांच दिन या 40 दिन के लिए आते है। जब भारत में ‘जनता कर्फ्यू’ का ऐलान हुआ उस वक्त बहोत सारे लोग मरकज में रह रहे थे। 22 मार्च को प्रधान मंत्री ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया, उसी दिन मरकज को बन्द कर दिया गया। बाहर से किसी भी आदमी को नहीं आने दिया गया। जो लोग मरकज में रह रहे थे उन्हें घर भेजने का इंतजाम किया जाने लगा।

21 मार्च 2020 को से ही रेल सेवाएं अचानक बंद कर दी गई, इसलिए बाहर के लोगों को भेजना मुश्किल था। फिर भी दिल्ली और आसपास के करीब 1500 लोगों को घर भेजा गया, अब करीब 1000 लोग मरकज में बच गए थे। जनता कर्फ्यू के साथ-साथ 22 मार्च से 31 मार्च तक के लिए दिल्ली में लॉकडाउन का ऐलान हो गया। इस वजह से बस या निजी वाहन भी मिलने बंद हो गए। पूरे देश से आए लोगों को उनके घर भेजना मुश्किल हो गया। ये लोग पूरे देश से आए हुए थे।

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का आदेश मानते हुए हम लोगों ने लोगों को बाहर भेजना सही नहीं समझा, सभी को मरकज में ही रखना बेहतर था। 24 मार्च को अचानक SHO निज़ामुद्दीन ने हमे नोटिस भेजा कि हम धारा 144 का उलंघन कर रहे है। हमने उसी दिन उनको जवाब दिया की मरकज को बन्द कर दिया गया है। 1500 लोगों को उनके घर भेज दिया गया है। अब 1000 बच गए हैं जिनको भेजना मुश्किल है क्योंकि ये दूसरे राज्यों से आए है। हमने ये भी बताया कि हमारे यहां विदेशी नागरिक भी है।

जिसके बाद हमने SDM को अर्जी दे कर 17 गाड़ियों के लिए कर्फ्यू पास मांगा, ताकि लोगों को घर भेजा जा सके। हमे अभी तक को पास जारी नहीं हुई है। 25 मार्च को तहसीलदार और एक मेडिकल कि टीम आई और उन्होंने लोगों कि जांच की। 26 मार्च को हमें SDM के ऑफिस में बुलाया गया और DM से भी मुलाकात कराया गया। इस दौरान हमने फंसे हुए लोगों की जानकारी दी और कर्फ्यू पास मांगा।

27 मार्च को 6 लोगों की तबीयत खराब होने की वजह से मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया। 28 मार्च को SDM और WHO की टीम 33 लोगों को जांच के लिए ले गई जिन्हें राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में रखा गया। 28 मार्च को ACP लाजपत नगर के पास से नोटिस आया कि हम गाइडलाइंस और कानून का उलंघन कर रहे है। हमने इसका पूरा जवाब दूसरे ही दिन (29 मार्च) भेज दिया।

30 मार्च को अचानक ये खबर सोशल मीडिया में फैल गई की कोराना के मरीजों की मरकज में रखा गया है और टीम वहा रेड कर रही है। मुख्यमंत्री ने भी मुकदमा दर्ज करने के आदेश दे दिए, अगर उनको हकीकत मालूम होती तो वह ऐसा नहीं करते। हमने लगातार पुलिस और अधिकारियों को जानकारी दी के हमारे यहां लोग रुके हुए है। वह लोग पहले से यहां आए हुए थे। उन्हें अचानक इस बीमारी की जानकारी मिली। हमने किसी को भी बस अड्डा या सड़कों पर घूमने नहीं दिया और मरकज में बन्द रखा जैसा के प्रधानमंत्री का आदेश था। हमने ज़िम्मेदारी से काम किया।

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