मोदी सरकार बदले की राजनीति छोड़े और अर्थव्यवस्था को इस मानव-निर्मित संकट से बाहर निकाले: देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था पर डॉ. मनमोहन सिंह का बयान

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पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था पर बड़ा बयान देते हुए कहाँ है कि नरेंद्र मोदी की सरकार को बदले की राजनीति छोड़ कर इस मानव-निर्मित संकट से कैसे बाहर निकला जाए इस की चिंता करनी चाहिए।

डॉ मनमोहन सिंह
(AP Photo/Manish Swarup)

उन्होंने ने एक वीडियो मैसेज में कहा, “हमारे युवा, किसान और खेत मजदूर, उद्यमी एवं सुविधाहीन व गरीब वर्गों को इससे बेहतर स्थिति के हक़दार हैं। भारत इस स्थिति में ज्यादा समय नहीं रह सकता। इसलिए मैं सरकार से आग्रह करता हूँ कि वो बदले की राजनीति छोड़े और सभी बुद्धिजीवियों एवं विचारकों का सहयोग लेकर हमारी अर्थव्यवस्था को इस मानव-निर्मित संकट से बाहर निकाले।”

देश में नब्बे के दशक में वित्त मंत्री की हैसियत से आर्थिक उदारीकरण के जनक रहे डॉ सिंह की अर्थव्यवस्था पर गहरी पकड़ रही है। 2016 में मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले के बाद सदन में भाषण देते हुए डॉ सिंह ने कहा था कि केंद्र सरकार के इस फैसले से देश का आर्थिक विकास दो प्रतिशत काम हो जाएगा। कुछ ही महीने बाद उनकी भविष्यवाणी सटीक साबित हुई जब भारत का आर्थिक विकास वाक़ई २ फीसद काम हो गया।

अपने वीडियो सन्देश में डॉ सिंह ने रविवार को आगे कहा, “आज अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत चिंताजनक है। पिछली तिमाही जीडीपी (GDP) केवल 5 प्रतिशत की दर से बढ़ी , जो इस ओर इशारा करती है कि हम एक लंबी मंदी के दौर में हैं। भारत में ज्यादा तेजी से वृद्धि करने की क्षमता है, लेकिन मोदी सरकार के चौतरफा कुप्रबंधन के चलते अर्थव्यवस्था में मंदी छा गई है।

“चिंताजनक बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर केवल 0.6 प्रतिशत है। इससे साफ हो जाता है कि हमारी अर्थव्यवस्था अभी तक नोटबंदी के ग़लत फ़ैसले और जल्दबाज़ी में लागू किए गए जीएसटी की नुक़सान से उबर नहीं पाई है।”

पूर्व प्रधानमंत्री के अनुसार घरेलू मांग में काफी गिरावट है और वस्तुओं के उपयोग की दर 18 महीने में सबसे निचले स्तर पर है। नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर 15 साल के सबसे निचले स्तर पर है। टैक्स राजस्व में बहुत कमी आई है। टैक्स ब्युओएंसी, यानि जीडीपी की तुलना में टैक्स की वृद्धि काल्पनिक रहनेवाली है क्योंकि छोटे व बड़े सभी व्यवसायियों के साथ ज़बरदस्ती हो रही है है और टैक्स आतंकवाद बेरोकटोक चल रह है। निवेशकों में उदासी का माहौल हैं। ये अर्थव्यवस्था में सुधार के आधार नहीं हैं।

उन्होंने कहा , “मोदी सरकार की नीतियों के चलते भारी संख्या में नौकरियां खत्म हो गई हैं। अकेले ऑटोमोबाईल सेक्टर में 3.5 लाख लोगों को नौकरियों से निकाल दिया गया है। असंगठित क्षेत्र में भी इसी प्रकार बड़े स्तर पर नौकरियां कम होंगी, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था में सबसे कमजोर कामगारों को रोज़ी-रोटी से हाथ धोना पड़ेगा।”

डॉ सिंह ने आगे कहा कि संस्थानों पर हमले हो रहे हैं और उनकी स्वायत्ता खत्म की जा रही है। सरकार को 1.76 लाख करोड़ रु. देने के बाद आरबीआई की आर्थिक कुप्रबंधन को वहन कर सकने की क्षमता का टेस्ट होगा, और वहीं सरकार इतनी बड़ी राशि का इस्तेमाल करने की फ़िलहाल कोई योजना न होने की बात करती है।

उनका कहना था , “इसके अलावा इस सरकार के कार्यकाल में भारत के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लगा है। बजट घोषणाओं एवं रोलबैक्स ने अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास को झटका दिया है। भारत, भौगोलिक-राजनीतिक गठजोड़ों के कारण वैश्विक व्यापार में उत्पन्न हुए अवसरों का लाभ उठाते हुए अपना निर्यात भी नहीं बढ़ा पाया। मोदी सरकार के कार्यकाल में आर्थिक प्रबंधन का ऐसा बुरा हाल हो चुका है।

“ग्रामीण भारत की स्थिति बहुत गंभीर है। किसानों को उनकी फसल के उचित मूल्य नहीं मिल रहे और गांवों की आय गिर गई है। कम महंगाई दर, जिसका मोदी सरकार प्रदर्शन करना पसंद करती है, वह हमारे किसानों की आय कम करके हासिल की गई है, जिससे देश में 50 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या पर चोट मारी गयी है।”

डॉ सिंह का ये ताज़ा बयान ऐसे समय आया है जब नए वित्तीय साल के पहले तिमाही में भारत के आर्थिक विकास की गति को बड़ा धक्का लगा है। GDP के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार आर्थिक विकास की दर अब सिर्फ ५% तक रह गयी है। ऐसे में विशेषज्ञों का माना है कि अगर समय रहते कुछ नहीं किया गया तो आने वाले समय में भारतीत अर्थव्यवस्था में और भी मंडी आ सकती है।

 

 

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