चारा घोटाला: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव दोषी करार, 3 जनवरी को होगा सजा का ऐलान, रांची के स्पेशल CBI कोर्ट ने सुनाया फैसला

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बहुचर्चित चारा घोटाले के एक और मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को अदालत ने दोषी करार दिया है। रांची स्थित केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने शनिवार (23 दिसंबर) को फैसला सुनाया। 950 करोड़ रुपये के चारा घोटाले से जुड़े देवघर कोषागार से 89 लाख, 27 हजार रुपये की अवैध निकासी के मामले में सभी दोषियों को अगले साल 3 जनवरी 2018 को सजा सुनाई जाएगी।

Express file photo of Lalu Prasad Yadav

हालांकि कोर्ट ने 22 आरोपियों में से लालू यादव समेत 16 लोगों को दोषी ठहराया गया है, जबकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा समेत 6 आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया है। लालू को कोर्ट से सीधे रांची की बिरसा मुंडा जेल ले जाया गया है। गौरतलब है कि इस घोटाले से जुड़े एक मामले में 2013 में निचली अदालत ने लालू को दोषी करार दिया था।

कोर्ट से लालू प्रसाद यादव को सीधे जेल ले जाया जाएगा। अब 3 जनवरी तक फिलहाल लालू यादव को जेल में ही रहना होगा। रांची स्थिति सीबीआई के विशेष न्यायाधीश शिवपाल सिंह ने फैसला सुनाया है। शिवपाल सिंह की सीबीआई कोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों के गवाहों के बयान दर्ज करने और बहस के बाद अपना फैसला 13 दिसंबर को सुरक्षित रख लिया था।

 

लालू को पहले ही पांच साल की हो चुकी है सजा

गौरतलब है कि इससे पहले चाईबासा कोषागार से 37 करोड़, सत्तर लाख रुपये अवैध ढंग से निकासी करने के चारा घोटाले के एक अन्य मामले में इन सभी को सजा हो चुकी है। तीन अक्तूबर 2013 को रांची स्थित सीबीआई के विशेष न्यायाधीश प्रवास कुमार सिंह की अदालत ने लालू को पांच साल की सुनाई थी।

साथ ही अदालत ने 25 लाख का जुर्माना भी अदा करने को कहा था। चाईबासा तब अविभाजित बिहार का हिस्सा था। हालांकि उस मामले में लालू प्रसाद फिलहाल जमानत पर हैं। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद वे संसद की सदस्यता गंवा बैठे और चुनाव लड़ने के भी अयोग्य हो गए।

38 लोग थे आरोपी

वर्ष 1990 से 1994 के बीच देवघर कोषागार से 89 लाख, 27 हजार रुपये की फर्जीवाड़ा करके अवैध ढंग से पशु चारे के नाम पर निकासी के इस मामले में कुल 38 लोग आरोपी थे, जिनके खिलाफ सीबीआई ने 27 अक्तूबर, 1997 को मुकदमा संख्या आरसी/64 ए/1996 दर्ज किया था और लगभग 21 वर्षों बाद इस मामले में आज फैसला आने की संभावना है।

इस मुकदमे में लालू, पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा, बिहार के पूर्व मंत्री विद्यासागर निषाद, पीएसी के तत्कालीन अध्यक्ष जगदीश शर्मा एवं ध्रुव भगत, आर के राणा, तीन आईएएस अधिकारी फूलचंद सिंह, बेक जूलियस एवं महेश प्रसाद, कोषागार के अधिकारी एस के भट्टाचार्य, पशु चिकित्सक डा. के के प्रसाद तथा शेष अन्य चारा आपूर्तिकर्ता आरोपी थे।

11 आरोपियों की हो चुकी है मौत

सभी 38 आरोपियों में से जहां 11 की मौत हो चुकी है, वहीं तीन सीबीआई के गवाह बन गये जबकि दो ने अपना गुनाह कुबूल कर लिया था, जिसके बाद उन्हें 2006-07 में ही सजा सुना दी गयी थी। इस प्रकार इस मामले में शुक्रवार (23 दिसंबर) को अदालत कुल 22 आरोपियों के खिलाफ ही अपना फैसला सुनाया।

शिवपाल सिंह की अदालत ने इस मामले में सभी पक्षों के गवाहों के बयान दर्ज करने और बहस के बाद अपना फैसला 13 दिसंबर को सुरक्षित रख लिया था। लालू के अधिवक्ता चितरंजन प्रसाद ने बताया कि इस मामले में यदि लालू एवं अन्य को दोषी ठहराया जाता है तो उन्हें अधिकतम सात वर्ष की एवं न्यूनतम एक वर्ष की कैद की सजा होगी।

इस बीच सीबीआई के सूत्रों ने बताया कि देवघर कोषागार से फर्जीवाड़ा करके अवैध ढंग से धन निकालने के इस मामले में लालू प्रसाद यादव एवं अन्य के खिलाफ सीबीआई ने आपराधिक षड्यंत्र, गबन, फर्जीवाड़ा, साक्ष्य छिपाने, पद के दुरुपयोग आदि से जुड़ी भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120बी, 409, 418, 420, 467, 468, 471, 477 ए, 201, 511 के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (डी) एवं 13 (2) के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

क्या है चारा घोटाला?

बता दें कि चारा घोटाला मामला सरकार के खजाने से 900 करोड़ रुपए की फर्जीवाड़ा का है। इसमें पशुओं के लिए चारा, दवाओं आदि के लिए सरकारी खजाने से पैसा निकाला गया था। चारा घोटाला पहली बार 1996 में सामने आया। उस वक्त लालू यादव की सरकार थी। इस घोटाले में 950 करोड़ रुपए के गबन का आरोप है। पशुपालन विभाग के अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत से इस घोटाले को अंजाम दिया गया था।

 

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