कर्नाटक चुनाव परिणाम: सरकार बनाने के लिए सियासी रस्साकशी की कोशिशें तेज, येदियुरप्पा या कुमारस्वामी किसे मिलेगा मौका? PM मोदी के खास रहे राज्यपाल वजुभाई पर टिकी सबकी निगाहें

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कर्नाटक में मंगलवार (15 मई) को विधानसभा चुनाव के नतीजे तो आ गए लेकिन सरकार किसकी बनेगी ये अब तक साफ नहीं पाया है। त्रिशंकु की परिस्थिति में राज्यपाल वजुभाई आर. वाला की भूमिका अहम हो जाती है। यही वजह है कि राज्य में चुनाव परिणाम की घोषणा के साथ नया सियासी दंगल शुरू हो गया है। दोपहर तक के रुझानों में बहुमत के करीब दिख रही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) शाम होते-होते सरकार बनाने की दौड़ में पिछड़ती नजर आई। यह देख कांग्रेस ने तुरंत जनता दल सेक्युलर (जेडीएस) को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे दिया।

PHOTO: Wikimedia Commons

कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कहा है कि एच डी कुमारास्वामी कांग्रेस के समर्थन वाली जद-एस नीत सरकार के मुख्यमंत्री होंगे। सरकार बनाने को लेकर दोनों दलों के बीच बैठक के बाद उन्होंने यह बयान दिया। सबसे बड़े दल के रूप में उभरी बीजेपी भी पीछे नहीं रही और उसने भी राज्यपाल से मिलकर अपना दावा पेश कर दिया। सत्ता के इस पेच में अब सारी नजरें राज्यपाल वजुभाई वाला पर टिक गई है कि वह किसे मौका देते हैं। सरकार बनाने के इंतजार में बैठी बीजेपी और कांग्रेस+जनता दल (सेक्युलर) राज्यपाल वजुभाई के फैसले का इंतजार कर रही हैं।

बता दें कि कर्नाटक विधानसभा की 224 में से 222 सीटों के लिए 12 मई को मतदान हुआ था। 224 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 112 सीटें जरूरी हैं। 224 सीटों में से 222 के नतीजे घोषित हो गए हैं और बीजेपी को 104, कांग्रेस को 78, जेडीएस गठबंधन को 38 और अन्य को दो सीटें मिली हैं। ऐसे में कोई भी पार्टी बहुमत के जादुई आंकड़े 112 को नहीं छू सकी है।

104 सीटों के साथ बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है लेकिन वह बहुमत के आंकड़े से 8 सीट पीछे है। यही देख कांग्रेस ने 78 सीटें होने के बावजूद 38 सीटों वाले जेडीएस को समर्थन देने का दांव चला। थोड़ी देर बाद जेडीएस ने भी समर्थन और एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने की कांग्रेस की पेशकश मंजूर कर ली। कांग्रेस और जेडीएस को मिलाकर 116 सीटें हो जाती हैं, जो बहुमत से 4 ज्यादा है।

PM मोदी के खास रहे हैं राज्यपाल वजुभाई

राज्य में विधानसभा चुनाव के नतीजे कुछ ऐसे आए हैं कि कोई भी पार्टी अकेले सरकार बना पाने की स्थिति में नहीं है। दावा दोनों पक्षों की ओर से किया गया है, ऐसे में फैसला अब राज्यपाल को अपने विवेक के आधार पर लेना है। गोवा, मणिपुर जैसे राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद सरकार बनाने में चूक गई कांग्रेस खुद ही देवेगौड़ा के पुत्र और जेडीएस नेता कुमारस्वामी के सामने मुख्यमंत्री बनाने का न्योता लेकर पहुंच गई। कुमारस्वामी ने राज्यपाल वजुभाई वाला को पत्र लिखकर कांग्रेसी समर्थन स्वीकारने की सूचना दी और बाद में मिलकर सरकार बनाने का दावा भी ठोक दिया। वहीं, बीजेपी नेता येद्दयुरप्पा ने भी राज्यपाल से मुलाकात कर सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है।

जाहिर है कि अब बहुत कुछ कर्नाटक के राज्यपाल पर निर्भर करेगा कि वह पहले किसे सरकार गठन के लिए आमंत्रित करते हैं। राज्यपाल जिस पार्टी को पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे, वो अपने हिसाब से विधायकों को ‘जोड़-तोड़ कर’ संख्याबल जुटाने का प्रयास करेगी। यह बहुत संभव है कि जोड़-तोड़ कर कर्नाटक में सरकार बना ली जाए और इसीलिए सभी की नजरें अब राज्यपाल के फैसले पर टिकी हैं। राज्यपाल वजुभाई आर वाला के बारे में यदि आपको पता हो तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे करीबी लोगों में से एक रहे हैं।

गुजरात सरकार में वित्त मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष रहे वजुभाई ने एक वक्त पीएम मोदी के लिए खुद की सीट भी छोड़ दी थी। ताकि उस समय पहली बार मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी 2001 में अपना पहला चुनाव लड़ पाएं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपनी ‘वफादारी’ साबित करते हैं या फिर दूसरे पक्ष को मौका देते हैं। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के साथ लंबे समय तक जुड़े रहने वाले वजुभाई जनसंघ के संस्थापकों में से एक हैं। पीएम मोदी के करीबी समझे जाने वाले 79 वर्षीय वाला आरएसएस के पुराने स्वयंसेवक हैं और उनके नाम पर गुजरात के वित्त मंत्री के तौर पर 18 बजट पेश करने का रिकॉर्ड है।

बीजेपी की गुजरात इकाई में संकट प्रबंधक की छवि हासिल कर चुके वजुभाई वाला को 1990 के दशक के मध्य में तब प्रदेश पार्टी अध्यक्ष बनाया गया था जब शंकरसिंह वाघेला ने बगावत कर दी थी और केशुभाई पटेल सरकार गिर गई थी। वह गुजरात के वित्त मंत्री के रूप में 2002 से 2012 तक मोदी के बाद दूसरे नंबर पर थे। केशुभाई पटेल के दौर में भी उनका यही दर्जा था। वाला ने अपने गृह नगर राजकोट से आरएसएस के साथ अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। उस दौरान वह जनसंघ से जुड़े और आपातकाल में जेल में भी गए।

 

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