कांवड़ियों का हुड़दंग: चेहरों की भीड़ में कहीं खो ना जाए इंसान, पर पक्ष चुन लेने की इतनी जल्दी मत दिखाइए

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पहले दिल्ली, अब बुलंदशहर, सोशल मीडिया पर इन दिनों कांवड़ियों के हुड़दंग के वीडियोज़ छाए हुए हैं। कुछ लोग कुछ कावंड़ियों की हरकत को धर्म के अतिरेक से जोड़कर देख रहे, तो कुछ कावंड़ यात्रा पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं। धर्म व्यक्तिगत मामला है।

कांवड़ियों

अच्छा तो यही होता कि ये लोगों के घरों तक सीमित रहता, पर कावड़ियों या किसी भी धर्म के जलसों में होने वाली ऐसी हरकतों का इतना सरलीकरण मत कीजिए। फैसला सुनाने की, नफ़रत करने की, पक्ष चुन लेने की इतनी जल्दी मत दिखाइए। आज ये कावड़िये हैं, कल शब-ए-बारात का जलसा हो सकता है, परसों मटकी फोड़ने वाले गोविंदा, या गुरु पर्व में शामिल लोग…अपने धार्मिक या राजनैतिक मतों के हिसाब से पाला तो आप बदल लेंगें, लेकिन क्या परिणाम बदल पाएंगे?

मैं कई साल दिल्ली में रही हूं, कावंड़ियों को करीब से देखा है…कावंड़ यात्रा की वजह से छोटी-बड़ी असुविधाएं भी झेली हैं; जिस तेवर और अकड़ की परणिति दिल्ली और बुलंदशहर की घटनाओं के रूप में हुई है उनकी भुक्तभोगी भी रह चुकी हूं, पर सच ये भी है कि सिर्फ इतने भर से मैं सभी कावंड़ियों को दोषी नहीं मान सकती। रास्तों के डायवर्ज़न्स, इतने लोगों का जयघोष या ऊंची आवाज़ किसी को असहज कर सकती है, लेकिन उनके नज़रिए से देखें तो इतना लंबा सफर पैदल तय करने के लिए ताकत और उत्साह बनाए रखना ज़रूरी है।

इसके लिए बम भोले का उद्घोष करना, भजन वगैरह गाने में कुछ ग़लत या अजीब नहीं है…पुराने ज़माने में भी जब सेनाएं युद्ध के लिए जाती थीं, तो पूरे रास्ते ढोल-नगाड़े बजते थे, ताकि पैदल चलने वाले सैनिकों को थकान महसूस ना हो, गांवों में जब खेतों में रोपाई होती है तो औरतें ऊंची आवाज़ में गाने गाती हैं, ताकि काम बोझ ना महसूस हो। सच ये भी है कि घटनाओं का सिर्फ एक पक्ष नहीं होता। हो सकता है जिस गाड़ी पर कावंड़ियों ने अपना गुस्सा उतारा ग़लती उसकी भी हो, जैसा कि कुछ लोग दावा कर रहे हैं।

अगर ऐसा था, तो भी ये दो लोगों के बीच झगड़ा था, फिर इतने कावंड़िये क्यों हंगामे पर उतर आए? जब ये लोग गाड़ी के शीशे तोड़ रहे थे, मानसिक संतुलन खोए रोगी तरह कार पर गुस्सा उतार रहे थे तो उस वक्त क्या चल रहा होगा इन लोगों के दिमाग में? भगवान शिव का खयाल तो यकीनन नहीं होगा। धर्म और आध्यात्मिकता चित्त को शांत करती है, संयम सिखाती है, मानसिक शांति देती है…गुस्से में तमतमाए उन चेहरों को देखिए ज़रा, क्या श्रद्धा दिखती है आपको उसमें? कोई संयम, कोई भक्ति नज़र आती है?

इसलिए मैं तोड़फोड़ करने वाली इस भीड़ को किसी धर्म से जोड़ कर नहीं देख पाती हूं। आप भी धर्म-वर्म को बीच में मत लाइए, क्योंकि ये धर्म की बात है ही नहीं, ये कावंड़ियों की बात भी नहीं है, ये उस मानसिकता का सवाल है जो हमें एक इंडिविजुअल से भीड़ बना डालती है और मुझे डर है कि हम बहुत तेज़ी से भीड़ बनते जा रहे हैं। ये यूं ही नहीं हो रहा है कि ज़रा-ज़रा सी बात पर दो समुदाय लड़ने-मरने पर उतारू हो जाते हैं, व्हॉट्सएप पर फैली एक अफवाह पर किसी को पीट-पीट कर मार डालते हैं। मुझे भीड़ में शामिल इन लोगों पर गुस्सा नहीं आता, दया आती है। एक इंसान होने के नाते कितनी क्षमताएं, कितनी संभावनाएं हैं इनके पास, लेकिन उन क्षमताओं का इस्तेमाल क्या हो रहा है?

इस भीड़ को कभी डिकोड करके देखिएगा कभी। इसके चेहरों को अलग-अलग करके देखेंगे तो आपको डरे हुए, असंतुष्ट, दुखी, और नाराज़ चेहरे नज़र आएंगे। ये इतने कमज़ोर और इतने दिशाहीन हैं कि समझ ही नहीं पाते कि ज़िंदगी में करना क्या है और जाना कहां हैं? करने को काम नहीं है, देखने को सपने नहीं हैं, पूरा करने के लिए लक्ष्य नहीं हैं, पर यही लोग जब भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं, तो इनमें ताकत आ जाती है। अब इन्हें किसी ज़िम्मेदारियों का डर नहीं होता, किसी के लिए जवाबदेही नहीं होती…थोड़ी देर के लिए ही सही, इन्हें एक मकसद मिल जाता है। यही भीड़ है, जो रातों-रात किसी भी ऐरे-गैरे को अपना पूजनीय बाबा बना बैठती है, जिन लोगों से डरना चाहिए उन्हें ख़ुद पर राज करने का मैंडेट दे देती है, किसी की अंध भक्त और किसी की अंध विरोधी बन जाती है और उसी भक्ति और विरोध को अपनी ज़िंदगी का मकसद मान बैठती है। आदिमानवों की तरह किसी बेगुनाह (चाहे गुनहगार ही क्यों ना हो) को घेर कर मार देने वाली ये भीड़, धर्म के नाम पर दंगे, उत्पात करने वाले ये झुंड इसलिए पनप रहे हैं क्योंकि भीड़ बनना आसान है, मुश्किल है इंडिविजुअल बने रहना।

भीड़ सिर्फ भीड़ होती है, उसका अपना दिमाग नहीं होता, उसमें इंसान नहीं होते, रिश्ते नहीं होते, चेहरा, दिल, दिमाग कुछ नहीं होता, उन्हें किसी भी दिशा में हकाया जा सकता है, इसलिए हमारा भीड़ बने रहने में ही हुक्मरानों का भला है। ये किसी एक पार्टी, किसी एक नेता का किया-धरा नहीं है, इसमें सब शामिल हैं। जब हम अपने दिमाग को ताले में बंद करके भीड़ बनते तो दरअसल हम उन ताकतों के हाथ में खेल रहे हैं, जिन्हें हमसे कोई लेना-देना नहीं है। वो आज इस भीड़ को इस्तेमाल करेंगे, जब मकसद पूरा हो जाएगा तो दूसरी भीड़ जुटाना शुरू कर देंगे। हर घटना पर कॉलर तान लेने या बदला लेने पर उतारू होने से पहले एक बार सोच कर देखिए कि हमारे भीड़ बन जाने में किसका भला है…सारा खेल साफ़-साफ़ दिखने लगेगा।

(Kanchan Pant is the author of book Bebaak. Views expressed here are her own and Janta Ka Reporter doesn’t endorse them)

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