‘जूस’ सिर्फ एक फिल्म नहीं हैं, 9 मिनट के अंदर अपने किरदार में झांकने का एक मौका है

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रोजमर्रा जिन्दगी की भागदौड़ में हम यह जान ही नहीं पाते कि खुद से मुलाकात किए हुए कितना वक्त बीत चुका है। हमारे अंदर का पुरुष और उसके अंदर का अहम् हमें यह मौका ही नहीं देता कि यह समझ पाएं की किसी की ‘अनदेखी’ अनजाने में हो रही है। हमारा समाज और परिवार का ढांचा पुरुष-प्रधान मानसिकता के आधार पर रखा हुआ है जिसे बरसों से समाप्त करने का प्रयास सरकारें भी करती आ रही है और प्रगतिशील संगठन भी लेकिन बहुत सूक्ष्म में जाकर नीरज घेवन की शाॅर्ट फिल्म ‘जूस’ आपको बताती है इस पहल की शुरूआत का बिन्दु कहां से जन्म लेता है?

‘जूस’ एक आम सी कहानी है जिसका जिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन एक आम सी कहानी बहुत बड़े साम्राज्य की दिवारें भेद देती है, महिला सशक्तिकरण के हजारों प्रयासों पर नीरज घेवान की एक ‘जूस’ से चोट काफी है। इस शाॅर्ट फिल्म के 9 मिनट आपको एक ऐसी दुनिया का परिचय कराते है जो आपके आसपास होकर रोजमर्रा जिन्दगी से गुजरते हैं। हमारे घरों में ऐसे लम्हें अक्सर दिखाई पड़ते है जिसका हमें पता भी नहीं चलता कि हमने उन्हें कुचल दिया है।

‘जूस’ में शेफाली शाह कथानांक के अंत में जाकर सहज ही प्रतिरोध की आवाज मुखर करती है जो हजारों नगाड़ों के शोर से कहीं ज्यादा आक्रामक होकर हमें सुनाई देती है। आप हैरान रह जाते है कि ऐसा भी कहीं होता है…! लेकिन हमारे घरों में रोज शायद होता हो, जिसे हम कभी सुनते और देखते ही नहीं?

फिल्म की कहानी बताने की जरूरत नहीं है लेकिन कहानी के अंत तक पहुंचाने के लिए नीरज छोटे-छोटे टुकड़ों में आपको कीलें चुभाते हुए चलते है जैसे एक दृश्य बताता है कि घर की नौकरानी को जब चाय दी जाती है तब आप अंदर से हिल जाते है।

एक दूसरे दृश्य में घर में खेल रहे बच्चों में से जब मोबाइल गेम में मशगूल बच्ची से उसकी मां कहती है कि भाईयों के लिए थाली लगा दो तब फिल्म का क्लाइमेक्स दिखाने की बुनियाद पड़ जाती है… लेकिन हमें लगता है कि यह सहज है कहानी का पार्ट है। हम इसे भी देखते हुए आगे बढ़ जाते है लेकिन शेफाली के रूप में मधु का किरदार निभाने वाली गृहणी इस बात को सहज नहीं लेती और विरोध के स्वर को अपने अंदर महसूस करती है।

साढ़े चौदह मिनट के कुल समय वाली यह फिल्म अपने नौ मिनटों में और भी कई सारे जोरदार झटके आपको देती है। जिनसे हम ‘जूस’ और शराब पीते हुए रोज गुजरते है। नीरज घेवन ने ‘मसान’ की बदौलत कांस में फिल्म देखने के पारखी लोगों को खड़े होकर ताली बजाने पर मजबूर कर दिया था जिसके बाद हमारे दिग्गज फिल्म समीक्षकों को लगा था कि यह तो इसने ऐसे ही कर दिया होगा लेकिन नीरज घेवान ने बता दिया कि वो इस आर्ट से बखूबी वाकिफ है।

 

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