लोकतंत्र के मंदिर में महिला सांसद का अपमान, महिला होने पर करे गर्व या झेलते रहे दंश

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इनको हंसने दीजिये, रामायण के बाद आज इन्हें ऐसे हंसते हुए देख कर बहुत आनंद आ रहा है। जब देश के एक ज़िम्मेदार, सम्मानजनक तथा शीर्षतम पद पर आसीन पुरुष लोकतंत्र के मंदिर कहे जाने वाले संसद में किसी महिला के लिए इस तरह के अभद्र भाव प्रकट करते हैं तो उस देश में महिलाओं की स्थिति कितनी दयनीय होगी, दुनिया का कोई भी इंसान आसानी से इस बात का अंदाज़ा लगा सकता है।बेअदबी का आलम कुछ इस तरह से छाया हुआ है की एक सांसद महिला को ही इस दंश का सामना करना पड़ा है, आम महिलाओं की क्या बिसात। जब देश का नेतृत्वकर्ता ही ऐसी अभद्रता का परिचय देने में एक सेकंड का भी समय नही लेता तो आम जनता अगर महिलाओं के साथ ज्यादती करें भी तो इसमें क्या बुराई है! आज ज़रूरत है ऐसे नेताओं को ही नही बल्कि हम सब को महिलाओं के प्रति अपना नजरिया बदलने की।

न सिर्फ अपनी सीमाएं और शिष्टता समझने की बल्कि खुद को नियंत्रित करने की भी नितांत आवश्यकता है। ज़िन्दगी किसी की उस पर शासन किसी और का, शरीर किसी का पर उस पर भाव किसी और का, तन किसी का लेकिन पहनावा किसी और की पसंद का, पैर किसी के लेकिन चलने का तरीका किसी और का, मन किसी का लेकिन उस पर अंकुश किसी और का, होट किसी के लेकिन उन पर मुस्कान किसी और की।

हमारे देश में ऐसा बोलने वाले हज़ारो मिलेंगे जो कहते हैं महिला देवी का रूप होती है। लेकिन इस बात को मानने वाले चंद लोग ही हैं। वे क्या पहने, क्या बोलें, कैसे बात करें, कैसे चले, कैसे खाए, यहां तक की कैसे अपना सारा जीवन व्यतीत करें, यह तय करने का अधिकार हमारे पितृसत्तामक समाज में सिर्फ पुरुषों को है। हमारे देश में अधिकतर ऐसे दोगले लोगों की ही तूती बोला करती है।

पिछले कई दशकों से देश में हर रोज़ महिला उत्पीडन के सैंकड़ों केस सामने आ रहे हैं। और आज स्थिति पहले की तुलना में बद से बद्तर हो गई है। बेअदबी की हद् इतनी बढ़ गई है की 2 महीने की बच्ची तक को हवस का शिकार बनाया जा रहा है। सोचने वाली बात है की ऐसा क्यों होता आ रहा है, इसका कोई ठोस हल है या नहीं!

हल सिर्फ एक है हमारी, आपकी हम सब की इमानदारी। जी हां, जिस प्रकार मजबूत जड़ों वाला वृक्ष भारी तूफ़ान में भी पूरी इमानदारी से पंथियों को आश्रय और फल प्रदान करना नहीं भूलता और मजबूती से डटा रहता है उसी प्रकार इंसानों को भी बिना इंसानियत की भावना भूले, अपने और अपने भावी पीढ़ी की जड़ों को मजबूत रख कर आगे बढ़ना बहुत ज़रूरी है।

अगर पेरेंट्स पूरी इमानदारी से अपने बच्चों को सही और गलत का फर्क बताएं, उनकी हर एक छोटी बड़ी हरकतों का उनकी आकांक्षाओं का तन्मयता से ध्यान रखें, उनसे हर मुद्दे पर खुलकर बातें करें, उनकी वर्चुअल और रियल दोनों गतिविधियों की पूरी निगरानी एक सकारात्मक तरीके से करें तो यह संभव है की समाज में बढ़ रहा महिला अत्याचार खत्म हो सके।

न सिर्फ पेरेंट्स बल्कि स्कूल्स, कॉलेजेज सभी शिक्षण संस्थान, टीचर्स, डॉक्टर्स, वकील, जज, पत्रकार, छोटे से छोटा बड़े से बड़ा हर एक कर्मचारी, हर प्रोफेशनल, हर एक इंसान पूरी इमानदारी से अपनी जिम्मेदारियों का वहन करें, तो न सिर्फ महिला अपराध बल्कि हर तरह के अपराध में निश्चित रूप से कमी आएगी। और वह दिन भी ज़रूर आएगा जब हमारे देश की महिला खुद के महिला होने पर गर्व करेगी और एक स्वाभिमानी, स्वस्थ्य, सम्मानित, विकसित, शिष्ट और एक शिक्षित राष्ट्र का निर्माण सही मायने में हो पाएगा।

(इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘जनता का रिपोर्टर’ उत्तरदायी नहीं है।)

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