11 साल पहले इनाम नहीं जीत पाने की टीस दिल में रह गई थी, हॉकी चैंपियन बनाने वाले कोच हरेंद्र सिंह का अब भरा ज़ख्‍म

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ग्यारह बरस पहले रोटरडम में कांसे का तमगा नहीं जीत पाने की टीस उनके दिल में नासूर की तरह घर कर गई थी और अपनी सरजमीं पर घरेलू दर्शकों के सामने इस जख्म को भरने के बाद कोच हरेंद्र सिंह अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख सके।

भारत ने जूनियर हॉकी वर्ल्‍ड कप के फाइनल में बेल्जियम को 2-1 से हराकर खिताब जीता। भारत ने 15 साल पहले 2001 में इससे पहले यह खिताब जीता था।

कोच हरेंद्र सिंह
Photo courtesy: sportskeeda

फाइनल में प्रवेश के बाद जब हरेंद्र सिंह से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘‘यह मेरे अपने जख्म है और मैं टीम के साथ इसे नहीं बांटता। मैंने खिलाड़ियों को इतना ही कहा था कि हमें पदक जीतना है, रंग आप तय कर लो। रोटरडम में मिले जख्म मैं एक पल के लिये भी भूल नहीं सका था।’’ रोटरडम में कांस्य पदक के मुकाबले में स्पेन ने भारत को पेनल्टी शूट आउट में हराया था।

भाषा की खबर के अनुसार, भारत 2005 की रोटरडम में खेली गई प्रतियोगिता में सेमीफाइनल में हार गया था। इसके चलते उसके पास कांस्‍य पदक जीतने का मौका था लेकिन वह हार गया था।

पंद्रह बरस पहले आस्ट्रेलिया के होबर्ट में खिताब अपने नाम करने के बाद भारत ने पहली बार जूनियर हाकी विश्व कप जीता। भारत 2005 में स्पेन से कांस्य पदक का मुकाबला हारकर चौथे स्थान पर रहा था और उस समय भी कोच हरेंद्र सिंह ही थे। इससे पहले 2013 में दिल्ली में हुए टूर्नामेंट में भारत दसवें स्थान पर रहा था।

अपने सोलह बरस के कोचिंग कॅरियर में अपने जुनून और जज्बे के लिये मशहूर रहे हरेंद्र ने दो बरस पहले जब फिर जूनियर टीम की कमान संभाली, तभी से इस खिताब की तैयारी में जुट गए थे।

उनका किरदार ‘चक दे इंडिया’ के कोच कबीर खान (शाहरूख खान) की याद दिलाता है जिसने अपने पर लगे कलंक को मिटाने के लिये एक युवा टीम की कमान संभाली और उसे विश्व चैम्पियन बना दिया। हरेंद्र ने खिलाड़ियों में आत्मविश्वास और हार नहीं मानने का जज्बा भरा। लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि उन्होंने युवा टीम को व्यक्तिगत प्रदर्शन के दायरे से निकालकर एक टीम के रूप में जीतना सिखाया।

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