कानून मंत्रालय की रिपोर्ट में खुलासा: भारत में 6 हजार से अधिक न्यायाधीशों की कमी, प्रति 10 लाख लोगों पर हैं सिर्फ 19 जज

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भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर 19 न्यायाधीश हैं और देश में 6000 से अधिक न्यायाधीशों की कमी है जिनमें से 5000 से अधिक न्यायाधीशों की निचली अदालतों में कमी है। कानून मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक जनसंख्या का अनुपात प्रति 10 लाख लोगों पर 19.49 न्यायाधीश हैं। यह आंकड़ा उस दस्तावेज का हिस्सा है जिसे संसद में चर्चा के लिए मार्च में तैयार किया गया था।

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समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, दस्तावेज कहता है कि अधीनस्थ अदालतों में 5748 न्यायिक अधिकारियों की कमी है और 24 हाई कोर्ट में 406 खाली पद हैं। निचली अदालतों में फिलहाल 16,726 न्यायिक अधिकारी हैं जबकि वहां 22,474 न्यायिक अधिकारी होने चाहिए थे। हाई कोर्टों में न्यायाधीशों की मान्य संख्या 1079 हैं, जबकि वहां मात्र 673 न्यायाधीश हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 31 हैं और वहां छह रिक्तियां हैं।

इसी तरह, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्टों और निचली अदालतों में न्यायाधीशों के 6160 पद खाली हैं। न्यायाधीश जनसंख्या अनुपात पर बहस को अप्रैल, 2016 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर ने तब हवा दे दी थी जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में मुकदमों के पहाड़ से निबटने के लिए न्यायाधीशों की संख्या 21,000 से बढ़ाकर 40,000 करने में सरकार की निष्क्रियता पर अफसोस प्रकट किया था और कहा था, आप सारा बोझ न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते।

उन्होंने कहा था कि 1987 में जब विधि आयोग ने प्रति दस लाख लोगों पर न्यायाधीशों की संख्या 10 से बढ़ाकर 50 करने की सिफारिश की थी तब से अबतक कुछ भी आगे नहीं बढ़ा है। लेकिन बाद में सरकार ने इस तरफ इशारा किया कि 245वीं रिपोर्ट में विधि आयोग ने कहा कि प्रति व्यक्ति द्वारा दायर मामलों की संख्या भौगोलिक इकाइयों में घटती-बढ़ती है क्योंकि मामले दाखिल करने का जनसंख्या के आर्थिक और सामाजिक हालत से संबंध होता है।

आपको बता दें कि हाल ही में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 24 उच्च न्यायालयों (हाई कोर्ट) के मुख्य न्यायाधीशों से निचली अदालतों में न्यायायिक अधिकारियों की नियुक्त में तेजी लाने की अपील की थी क्योंकि बड़ी संख्या में मामलों के लंबित होने की वजह न्यायाधीशों की कमी है।

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