बिहार: लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में पहली बार RJD का सूपड़ा साफ, महागठबंधन पर भारी पड़ी NDA की चुनावी रणनीति

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देशभर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘प्रचंड लहर’ पर सवार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राष्ट्रवाद, हिंदू गौरव और ‘नए भारत’ के मुद्दों पर लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करके लगातार दूसरी बार केंद्र में सरकार बनाने जा रही है। भाजपा ने अकेले अपने दम पर 303 के जादुई आंकड़े को छूकर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है। वहीं, कांग्रेस 52 सीटों तक ही सिमट गई हैं। भाजपा की लहर इतनी प्रचंड थी कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने परिवार के गढ अमेठी में स्मृति ईरानी से हार गए, हालांकि वह केरल में वायनाड से जीत गए।

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इस लोकसभा चुनाव में बिहार में सबसे करारा झटका महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को लगा है। राजद का सूपड़ा साफ हो गया है, वहीं महागठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी (रालोसपा) भी चित्त हो गई। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की अभूतपूर्व 39 सीटों की जीत में जहां विपक्ष चारो खाने चित्त हो गई, वहीं लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) ने 100 फीसदी स्ट्राइक के साथ उसके सभी छह प्रत्याशी जीत गए। यही हाल भाजपा का रहा है, जहां उसके सभी 17 प्रत्याशी विजयी हुए।

बिहार में विजेता बनकर उभरी राजग की तरफ से भाजपा और जद (यू) ने क्रमश: 17 और 16 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, राम विलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की। भाजपा और लोजपा ने जहां सभी सीटों पर जीत दर्ज की, वहीं जदयू केवल एक सीट पर हारी। जबकि महागठबंधन की झोली में सिर्फ एक सीट गई है, जिसमें से बस कांग्रेस ने किशनगंज सीट पर कब्‍जा जमाया। वहीं, महागठबंधन में शामिल पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद की पार्टी राजद इस लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल पाई।

महागठबंधन में शामिल अन्य सभी दल राजग की इस आंधी में धाराशायी हो गए। राजद के गठन के बाद यह पहला मौका है जब राजद के एक भी सदस्य लोकसभा में नहीं होगा। महागठबंधन के एक अन्य घटक दल रालोसपा को सबसे नुकसान उठाना पड़ा। पिछले चुनाव में पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा ने तीन सीटों पर कब्जा जमाकर शत प्रतिशत सफलता पाई थी। उस समय रालोसपा राजग के साथ थी, परंतु इस चुनाव में रालोसपा ने पाला बदलकर महागठबंधन के साथ हो गई और शत प्रतिशत सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।

पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को इस चुनाव में दो सीटों उजियारपुर और काराकाट से हार का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, महागठबंधन में शामिल विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी), हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) भी खाता नहीं खोल सकी। रालोसपा, वीआईपी और हम के तीनों अध्यक्षों को भी हार का मुंह देखना पड़ा। इस चुनाव में सबसे ज्यादा 100 फीसदी स्ट्राइक रेट से लोजपा और भाजपा ने सफलता पाई। लोजपा इस चुनाव में छह सीटों पर चुनाव लड़ रही थी जबकि भाजपा 17 सीटों पर प्रत्याशी उतारी थी। दोनों पार्टियों के सभी प्रत्याशी ने जीत का परचम लहराया।

लालू की अनुपस्थिति के कारण राजद को नाकामी से होना पड़ा रूबरू

राजग में शमिल जद (यू) भी 17 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी, परंतु उसे किशनगंज सीट से हार का सामना करना पड़ा।माना जा रहा है कि पार्टी अध्यक्ष लालू प्रसाद की अनुपस्थिति के कारण राजद को इस बड़ी नाकामी से रूबरू होना पड़ा।चारा घोटाला के कई मामलों में रांची की एक जेल में सजा काट रहे लालू प्रसाद ने जेल से ही मतदाताओं को राजद की ओर आकर्षित करने की हर कोशिश की, परंतु चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि राजद की रणनीति को मतदाताओं ने नकार दिया।

लालू की अनुपस्थिति में पार्टी की कमान संभाल रहे लालू के पुत्र और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव ने राजद के वोट बैंक मुस्लिम-यादव (एम-वाई) समीकरण को साधने के लिए जातीय गोलबंदी करने की कोशिश की और आरक्षण समाप्त करने का भय दिखाकर ‘संविधान बचाओ’ के नारे जरूर लगाए, परंतु मतदाताओं ने उसे भी नकार दिया। राजद की ऐसी करारी हार इसके पहले कभी नहीं हुई थी।

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