अगर सरकार जल्लीकट्टू पर अध्यादेश लाई तोे ‘पेटा’ अपना सकती है कानूनी रास्ता

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पीपुल फॉर इथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) इंडिया ने गुरुवार को कहा कि यदि जल्लीकट्टू करवाने के लिए केंद्र अध्यादेश लाता है तो वह कानूनी रास्ता अख्तियार करेगा या तमिलनाडु में इस खेल के विरुद्ध लोगों के बीच जागरूकता फैलाएगा।

जल्लीकट्टू

पेटा प्रवक्ता मनिलाल वल्लीयाटे ने कहा, ‘हमारा अभियान सभी जानवरों के प्रति क्रूरता के खिलाफ है. यदि अध्यादेश आता है तो हम अपने वकीलों से संपर्क करेंगे और फिर निर्णय लेंगे।

इस संगठन ने यह भी दावा किया कि सांढों की कुछ खास प्रजातियां ‘श्वेत क्रांति’ और ‘संकरण कार्यक्रमों’ के चलते विलुप्त हो गई हैं।

उन्होंने कहा, ‘इस देशी नस्ल को बचाने के लिए अन्य दयालु संरक्षण तरीके हैं. जल्लीकट्टू एकमात्र तरीका नहीं है। तमिलनाडु सरकार ने 1980 के दशक में कई संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए।

वैसे जल्लीकट्टू उन दिनों भी होता था, लेकिन उसकी संख्या में गिरावट श्वेत क्रांति के दौरान संकरण कार्यक्रम के चलते आई। सांढ को काबू में करने से जुड़े इस खेल पर उच्चतम न्यायालय की पाबंदी के विरुद्ध तमिलनाडु और राष्ट्रीय राजधानी में तेज हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर पेटा प्रवक्ता ने कहा, सभी समर्थक सूचना की गलत व्याख्या के आधार पर विरोध कर रहे हैं।

मैं सभी नेताओं से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले भारतीय संविधान के प्रति समर्पित होने, तथ्यों को परख लेने और उच्चतम न्यायालय के फैसले को पढ़ लेने का अनुरोध करता हूं।

भाषा की खबर के अनुसार, उन्होंने कहा कि सांढ ‘शिकार’ श्रेणी में आते हैं और यदि उन्हें सड़क पर यू ही छोड़ दिया जाए तो वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। प्रवक्ता ने कहा, ‘वे केवल तभी लड़ाई या उछलने पर उतर आते हैं जब उन्हें उत्तेजित किया जाता है।

उत्तेजना केवल तभी हो सकती है जब वे दर्द, भय या जख्म महसूस कर रहे हों. जल्लीकट्टू में क्रूरता निहित है और आपको बस शिकार पशु को दौड़ने के लिए उकसाया जाता है या भयावह स्थिति पर प्रतिक्रिया दिलवाया जाता है।

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