बिहार में चमकी बुखार से 84 बच्चों के बाद अब लू से 44 लोगों की मौत

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बिहार में एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस (चमकी बुखार) की चपेट में आने से अब तक 80 बच्चों की मौत हो चुकी है। इसी बीच, अब राज्य में प्रचंड गर्मी और लू के कहर से अब तक कुल 44 लोगों की मौत हो चुकी है। सबसे ज्यादा गर्मी से मौतें औरंगाबाद, गया और नवादा से हुई हैं।

बिहार
फोटो: ANI

सनमाचार एजेंसी भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक, आपदा प्रबंधन विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार बिहार में लू लगने से कल तक 44 लोगों की मौत हो चुकी है। औरंगाबाद जिले में 22, गया में 20 और नवादा में दो लोगों की मौत लू लगने से हुई है। मौसम विभाग के पटना कार्यालय से प्राप्त जानकारी के मुताबिक, राज्य की राजधानी में शनिवार को अधिकतम तापमान 45.8 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया जो कि सामान्य से 9.2 डिग्री सेल्सियस अधिक था।

पटना में शनिवार को अधिकतम तापमान 2009 के बाद के पिछले 10 वर्षों के रिकॉर्ड को पार कर गया। पटना शहर में शनिवार को न्यूनतम तापमान 31.0 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य न्यूनतम तापमान से 4.2 डिग्री अधिक था। भीषण गर्मी के मद्देनजर पटना शहर में 19 जून तक के लिए स्कूलों को बंद करने का आदेश शनिवार को जारी किया गया।

बिहार के अन्य जिलों गया, भागलपुर और पूर्णिया में शनिवार को अधिकतम तापमान क्रमश: 45.2 डिग्री सेल्सियस, 41.5 डिग्री सेल्सियस और 35.9 डिग्री सेल्सियस रहा था। मौसम विभाग ने पटना, गया और भागलपुर जिलों में रविवार को भी भीषण गर्मी रहने और पूर्णिया जिले में बारिश अथवा गरज या धूल के साथ आंशिक रूप से बादल छाए रहने का पूर्वानुमान जताया है। विभाग के अनुसार बिहार में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के 22-23 जून तक आने की उम्मीद है।

समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक, मुजफ्फरपुर में एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस के कारण अब तक मरने वालों का आंकड़ा बढ़कर 84 हो गया है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बच्चों की मौत पर गहरा दुख जताया है और इस भयानक स्थिति को देखते हुए मरने वालों के परिवार वालों के लिए 4-4 लाख रुपये के मुआवजे का एलान किया है।

गौरतलब है कि बिहार के कई जिलों में एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस का कहर जारी है। बिहार में इसे चमकी बुखार भी कहा जाता है। बच्चों की मौतों पर नीतीश सरकार घिरती हुई नजर आ रहीं है। चमकी बुखार के कहर के चलते अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। एईएस के प्रकोप से मरने वाले ज्यादातर बच्चे समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के हैं। 

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