हाशिमपुरा नरसंहार पर आए फैसले ने खोली जर्जर भारतीय न्याय व्यवस्था की पोल

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दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार (31 अक्टूबर) को 31 साल पहले हुए 1987 हाशिमपुरा नरसंहार मामले में 42 लोगों की हत्या के लिए उत्तर प्रदेश प्रोविंशियल आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी (पीएसी) के 16 पूर्व जवानों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने इसे एक समुदाय के निहत्थे व निर्दोष लोगों का नरसंहार करार दिया। न्यायमूर्ति एस.मुरलीधर और न्यायमूर्ति विनोद गोयल ने 2005 के निचली अदालत के फैसले को पलट दिया। निचली अदालत ने 16 लोगों को हत्या और दूसरे अपराधों के आरोप से बरी कर दिया था।

Photo Source: Express photo by Praveen Jain

दिल्ली हाई कोर्ट ने इन 16 आरोपियों को आपराधिक साजिश, अपहरण, हत्या व साक्ष्यों को गायब करने का जिम्मेदार ठहराया। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर यह आदेश सुनाया है। ट्रायल कोर्ट ने जवानों को इस केस में संदेह का लाभ देते हुए बरी किया था, जिसके बाद पीड़ित पक्ष इस दोबारा हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। 31 साल पहले यानि 1987 में हुए इस मामले में 42 लोगों की हत्या कर दी गई थी।

इस मामले में मूल रूप से 19 आरोपी थे, लेकिन तीन की लंबे मुकदमे के दौरान मौत हो गई। सभी 16 आरोपी अब पीएसी से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। हाई कोर्ट ने सभी दोषियों को 22 नवंबर से पहले समर्पण करने का निर्देश दिया। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो संबंधित थाना प्रभारी (एसएचओ) को उन्हें हिरासत में लेने का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने इस तरह से एक सशस्त्र बल द्वारा निहत्थे, निर्दोष एक खास समुदाय के सदस्यों को निशाना बनाए जाने को एक विक्षुब्ध करने वाला पहलू बताया।

स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा हिरासत में हुआ नरसंहार था यह कांड

गाजियाबाद में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रहे विभूति नारायण राय ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से कहा, “स्वतंत्र भारत में यह पहला और सबसे बड़ा हिरासत में हुआ नरसंहार था।” विभूति नारायण राय ने 22-23 मई, 1987 की रात को मामले में पहली प्राथमिकी दर्ज की थी। इस मामले में आरोप-पत्र मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, गाजियाबाद के समक्ष 1996 में दाखिल किया गया था।

नरसंहार पीड़ितों के परिवारों की एक याचिका के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को सितंबर 2002 में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया था। दिल्ली की एक सत्र अदालत ने जुलाई 2006 में सभी आरोपियों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, साक्ष्यों से छेड़छाड़ और साजिश का आरोप तय किया था। इस मामले में आरोप-पत्र मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, गाजियाबाद के समक्ष 1996 में दाखिल किया गया था। नरसंहार पीड़ितों के परिवारों की एक याचिका के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को सितंबर 2002 में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया था।

50 मुस्लिम युवकों को जबरन उठा ले गए जवान

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक 22 मई 1987 को पीएसी के जवान उत्तर प्रदेश के मेरठ में हाशिमपुरा गांव से अल्पसंख्यक समुदाय के करीब 50 मुस्लिम युवकों को कथित तौर अपने साथ जबरन ले गए। पीड़ितों को बाद में गोली मार दी गई और उनके शवों को नहर में फेंक दिया गया। घटना में 42 लोगों को मृत घोषित किया गया। कहा जाता है कि 42 लोगों को गोली मारी गई, लेकिन इसमें से चार लोग मृत होने का बहाना कर बच निकले थे।

जिसके बाद 1988 में उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले में सीबी-सीआईडी जांच के आदेश दिए। फरवरी 1994 में सीबी-सीआईडी ने अपनी जांच रिपोर्ट सौंपी जिसमें 60 पीएसी और पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, 20 मई 1996 को उत्तर प्रदेश पुलिस की सीबी-सीआईडी द्वारा गाजियाबाद में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष 19 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दायर किया गया। 161 लोगों को गवाह के तौर पर सूचीबद्ध किया गया।

जर्जर न्याय व्यवस्था की खुली पोल

इस मामले में तब नया मोड़ आया जब सितंबर 2002 में पीड़ितों और घटना में बचे हुए लोगों की याचिका पर हस्तक्षेप करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। जुलाई 2006 में दिल्ली की अदालत ने 17 आरोपियों के खिलाफ भादंसं की धाराओं के तहत हत्या, हत्या के प्रयास, साक्ष्यों से छेड़छाड़ और साजिश के आरोप तय किए। लेकिन 21 मार्च 2015 को अदालत ने 16 जीवित आरोपियों को उनकी पहचान के संदर्भ में संशय का लाभ देते हुए बरी किया।

अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की पहचान और उनके खिलाफ लगे आरोपों को बिना शक साबित नहीं कर पाया। फिर 18 मई 2015 को पीड़ितों के परिजनों और इस घटना में जिंदा बचे प्रत्यक्षदर्शियों की तरफ से निचली अदालत के फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। 31 साल बाद 31 अक्टूबर 2018 को दिल्ली हाई कोर्ट ने पीएसी के 16 पूर्व कर्मियों को 42 लोगों की हत्या में दोषी पाए जाने पर आजीवन कारावास की सजा सुनाई। 31 साल बाद आए इस फैसले ने जर्जर भारतीय न्याय व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।

 

 

 

 

 

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