हनुमान जी के दलित होने के मायने: क्या हनुमान मंदिरों में अब पुजारी और महंत दलितों को नहीं बनाया जाना चाहिए?

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कभी कभी राजनेता ऐसे बयान दे देते हैं जिन्हें बाद में विश्लेषण कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं होता। इस बार ऐसा ही बयान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिया है जिन्होंने एक चुनावी सभा में यह दावा किया कि हिंदुओं के आराध्य भगवान हनुमान दलित थे। यूं तो महंत आदित्यनाथ की पृष्ठभूमि किसी से छुपी नहीं है पर इस बार चुनावी माहौल में वह बहुत आगे बढ़ गए।

Photo: Templesofindia

पिछली बार कर्नाटक में भी उन्होंने उस वक्त विवाद उत्पन्न कर दिया था जब उन्होंने हनुमान जी को कर्नाटक का रहने वाला बताया था। तब कई लोगों ने आदित्यनाथ पर आरोप लगाया था कि वह भगवान को क्षेत्रवाद में बांट रहे हैं, लेकिन इस बार तो उन्होंने कई कदम आंगे जाकर भगवान की जाति का ही विश्लेषण कर दिया। इससे विवाद छिड़ना तो स्वाभाविक ही था, पर विचार करने योग्य बात यह है कि योगी ने क्यों ये बयान दिया और इस बात के क्या मायने निकाले जा सकते है?

रामायण काल मे भी रही होगी ‘जाति प्रथा’

योगी आदित्यनाथ के बयान से यह दर्शाता है के त्रेता युग में भी समाज जातियों विभाजित रहा होगा। रामायण का एक अंश बताता है किस तरह भगवान राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे। लेकिन रामायण में भगवान माने गए पात्रों के बारे में ऐसा विश्लेषण नहीं मिलता है। श्री हनुमान चालीसा में अंजनी पुत्र को ज्ञान गुण सागर अर्थात असीम ज्ञान वाला बताया है, परंतु यह मनु के विधान से मेल नहीं खाता।

जहां अस्पृश्य वर्ग को ज्ञान अर्जित करने की मनाही थी और अगर हनुमान जी के पास ज्ञान था तो फिर बाद में अस्पृश्य को इससे क्यों विमुख कर दिया? इसके अलावा हनुमान जी के दलित होने से यह भी प्रतीत होता है कि क्यों उन्हें सेवक की भूमिका में माना गया है? जाति व्यवस्था में ऊपरी वर्णो की सेवा करना ही चतुर्वर्ण का धर्म है।

तो क्या इसीलिए हनुमान जी ने संजीवनी बूटी को हाथ नहीं लगाया और पूरा पहाड़ ही लेकर लक्ष्मण जी के जीवन को बचाने चल दिए? यह सारे विश्लेषण रामायण कथा में विरोधाभास पैदा करते हैं और बमुश्किल ही किसी भक्त ने सोचा होगा के उनके पूजनीय चरित्रों का ऐसा जातिगत चित्रण भी किया जा सकता है।

दलित शब्द को समझने में भूल कर गए योगी?

योगी जी एक और गलती कर गए हनुमान जी को दलित कह कर, क्योंकि दलित शब्द आधुनिक उत्पत्ति का है जिसे महात्मा ज्योतिबा फुले और भीमराव अंबेडकर सामाजिक क्रांति के अग्रदूतों ने प्रचारित किया। अनुसूचित जातियों को राजनीतिक शब्दावली में एक समूह के रूप में प्रस्तुत करने के लिए दलित शब्द का प्रयोग किया गया। वास्तव में दलित अस्पृश्य जातियों का समूह है तो योगी जी के सामने यह चुनौती उत्पन्न होती है कि दलित कोई जाति नहीं है बल्कि विभिन्न जातियों का समूह है।

योगी जी को इस देश को यह भी बताना चाहिए कि अगर हनुमान जी दलित थे तो वह किस जाति से संबंध रखते थे। जिस राज्य के योगी जी मुख्यमंत्री हैं वहीं पर अनुसूचित जाति अर्थात दलितों की 60 जातियां सूचीबद्ध है तो अगली बार योगी जी से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपने चुनावी भाषण में हनुमान जी की जाति का भी उल्लेख करें कि वह दलितों की किस जाति से ताल्लुक रखते थे।

क्या विश्वास को जातियों के ढांचे में बांधा जा सकता है?

धार्मिक दर्शनशास्त्र यह कहता है कि धर्म की बुनियाद विश्वास है और विश्वास भौतिकवाद पर आश्रित नहीं रहता इसीलिए सामाजिक जटिलताओं से ईश्वरीय चरित्रों को दूर रखा गया है। अर्थात ईश्वरी चरित्रों को जाति से ऊपर देखा जाता है। सनातन परंपरा में कुलदेवता महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं जिन्हें उनके कुलों द्वारा पूजा जाता है, परंतु हनुमान जैसे देवता कुलदेवता ऊपर का स्थान रखते हैं और यह आम जनमानस में पूज्यनीय रहे हैं।

इसलिए हनुमान जी किसी कुल के देवता रहें हो ऐसा भी कम ही प्रतीत होता है। तो क्या योगी आदित्यनाथ ने विश्वास को भौतिक सामाजिक पृष्ठभूमि से नहीं जोड़ दिया और एक ईश्वरीय चरित्र को जाति की जटिलताओं में बांधने का कार्य नहीं किया? निश्चित ही यह हनुमान जी के करोड़ों भक्त के विश्वास पर आघात पहुंचाने जैसा हो सकता है जो अपने देव को इन जातिय बंधनों से ऊपर ही देखते रहे होंगे।

अगर हनुमान दलित थे तो क्या बदलना चाहिए?

अगर गंभीरता से योगी आदित्यनाथ के कथन को सत्य मान लिया जाए और यह माना जाए कि हनुमान जी एक दलित थे तो यह प्रश्न फिर उठ खड़ा होता है कि आखिर वह कौन लोग थे जिन्होंने बाद में दलित वर्गों को अस्पृश्य की श्रेणी में डाल दिया और उनसे एक मानव होने के भी सभी अधिकार छीन लिए। क्या हनुमान मंदिरों में अब पुजारी और महंत दलितों को नहीं बनाया जाना चाहिए।

कई जगह पर ऐसी मांगे अब उठने भी लगी हैं कई दलित संगठनों ने यह मांग उठाई है की योगी आदित्यनाथ के इस बयान के बाद दलितों का यह अधिकार बनता है कि वह हनुमान मंदिरों के महंत और पुजारी बनाए जाएं। इसके साथ ही वर्णाश्रम में चतुर्वर्ण को आध्यात्मिक बराबरी का अधिकार भी सुनिश्चित होना चाहिए अब आध्यात्मिक रूप से एक ब्राह्मण और एक सूद्र मैं कोई अंतर नहीं होना चाहिए।

दलितों को भी द्विज धारण करने का आध्यात्मिक अधिकार प्राप्त होना चाहिए। इसके इतर जितने भी हनुमान भक्त सवर्णों में हैं उनको भी आगे बढ़कर अब दलितों से रोटी और बेटी का रिश्ता कायम करना चाहिए। और इस बयान के बाद योगी आदित्यनाथ से इसकी पहल की उम्मीद की जानी चाहिए

संविधान क्या कहता है?

भारत के संविधान के अनुच्छेद 51(अ) नागरिकों के मौलिक कर्तव्य में यह दिया गया है किस देश का हर नागरिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे। संवैधानिक पद पर बैठे एक व्यक्ति से इसकी अपेक्षा और ज्यादा बढ़ जाती है। अगर देश के सबसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री चुनावों में किवंदतियों को लेकर चुनावी रण में उतर रहा है तो यह प्रश्न खड़ा करता है कि क्या मुख्यमंत्री जी ने संविधान का अध्ययन किया है जिसकी रक्षा करने की शपथ लेकर वह उस कुर्सी पर बैठे हैं।

यह मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का भी मौलिक कर्तव्य है कि वह देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ाए न कि किवंदतियों के सहारे मुद्दों को भ्रमित करें। याद रहे कि अंत में देश आपसे यही सवाल करेगा कि यह कार्य तो आप गोरखमठ के महंत के रूप में भी कर सकते थे लेकिन लोगों ने आपको प्रदेश को चलाने और उस प्रदेश के करोड़ों लोगों का भविष्य संवारने के लिए चुना है।

(लेखक ….. हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘जनता का रिपोर्टर’ उत्तरदायी नहीं है।)

1 COMMENT

  1. कम से कम एक बार उस लाइन को पूरा तो सुन लेते जिसमें आप के अनुसार भगवान हनुमान को दलित कहा गया
    बस आधी अधूरी खबर पर लगे लाठी भांजने

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