गूगल ने डूडल बनाकर मशहूर शायर मिर्जा गालिब को किया याद, जानिए उनके बारे में कुछ खास बातें

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आज यानी बुधवार (27 दिसंबर) को उर्दू के मशहूर शायर मिर्जा गालिब की 220वीं जयंती है। शेर-ओ-शायरी के सरताज कहे जाने वाले और उर्दू को आम जन की जुबां बनाने वाले ग़ालिब को उनकी सालगिरह के अवसर पर गूगल ने एक खूबसूरत डूडल बना कर उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश की है। गूगल ने ‘Mirza Ghalib’s 220th Birthday’ शीर्षक से अपना डूडल बनाया है।गूगल ने गालिब साहब की एक फोटो शेयर की है। इस तस्वीर में गालिब के हाथों में कलम और पेन दिखाई दे रहा है। फोटो में वह बाहर की तरफ देख तरह है इस देखकर लग रहा है जैसे गालिब किसी सोच में डूब हुए है। बैकग्राउंड में मुगलकालीन वास्तुकला दिख रही है। पुरानी दिल्ली में उनके घर को अब संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक गूगल ने अपने ब्लॉग में लिखा है, ‘उनके (मिर्जा) छंद में उदासी सी दिखती है जो उनके उथलपुथल और त्रासदी से भरी जिंदगी से निकल कर आई है- चाहे वो कम उम्र में अनाथ होना हो, या फिर अपने सात नवजात बच्चों को खोना या चाहे भारत में मुगलों के हाथ से निकलती सत्ता से राजनीति में आई उथल-पुथल हो। उन्होंने वित्तीय कठिनाई झेली और उन्हें कभी नियमित सैलरी नहीं मिली।’

ब्लॉग के मुताबिक, ‘इन कठिनाइयों के बावजूद ग़ालिब ने अपनी परिस्थितियों को विवेक, बुद्धिमत्ता, जीवन के प्रति प्रेम से मोड़ दिया। उनकी उर्दू कविता और शायरी को उनके जीवनकाल में सराहना नहीं मिली, लेकिन आज उनकी विरासत को काफी सराहा जाता है, विशेषकर उर्दू गजलों में उनकी श्रेष्ठता को।’

आम आदमी का शायर

दरअसल, मिर्जा गालिब को आम आदमी का शायर भी कहा जाता है, क्योंकि हम रोजमर्रा की जिंदगी में कई ऐसे बातें और शेर बोल जाते हैं जो हमें उन्हीं की देन हैं। मिर्जा गालिब का पूरा नाम मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां था। उनका जन्म 27 दिसंबर 1797 को मुगल शासक बहादुर शाह के शासनकाल के दौरान आगरा के एक सैन्य परिवार में हुआ था। जिस वर्ष उनका निधन हुआ, उसी साल महात्‍मा गांधी का जन्‍म हुआ था।

साल था 1869 और पूरे 73 साल जीने के बाद उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। उन्होंने फारसी, उर्दू और अरबी भाषा की पढ़ाई की थी। बचपन से ही गालिब को कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा था। उर्दू और फारसी भाषाओं के मुगल कालीन शायर ग़ालिब अपनी उर्दू गजलों के लिए बहुत मशहूर हुए। उनकी कविताओं और गजलों को कई भाषाओं में अनूदित किया गया।

उन्होंने इश्क से लेकर रश्क तक प्रेमी-प्रेमिकाओं की भावनाओं को अपनी शायरी के जरिए बखूबी बयां किया। ग़ालिब मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बड़े बेटे को शेर-ओ-शायरी की गहराइयों की तालीम देते थे। उन्हें वर्ष 1850 में बादशाह ने दबीर-उल-मुल्क की उपाधि से सम्मानित किया। ग़ालिब ने 11 वर्ष की उम्र में शेर-ओ-शायरी शुरू की थी। तेरह वर्ष की उम्र में शादी करने के बाद वह दिल्ली में बस गए।

उनकी शायरी में दर्द की झालक मिलती है और उनकी शायरी से यह पता चलता है कि जिंदगी एक अनवरत संघर्ष है जो मौत के साथ खत्म होती है। ग़ालिब सिर्फ शेर-ओ-शायरी के बेताज बादशाह नहीं थे। अपने दोस्तों को लिखी उनकी चिट्ठियां ऐतिहासिक महत्व की हैं। उर्दू अदब में ग़ालिब के योगदान को उनके जीवित रहते हुए कभी उतनी शोहरत नहीं मिली जितनी इस दुनिया से उनके रुखसत होने के बाद मिली।

 

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