पहली बार मीडिया के सामने आए सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने अपनी चिट्ठी में भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर लगाए ये आरोप

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सुप्रीम कोर्ट के चार मौजूदा जजों ने शुक्रवार (12 जनवरी) को प्रेस कॉन्फेंस किया। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने मीडिया के सामने आकर देश के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद चारों जजों ने एक चिट्ठी जारी की, जिसमें कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन जजों ने सात पेज की जो चिट्ठी चीफ जस्टिस को लिखी है उसमें कई बातों का जिक्र है। चिट्ठी में जजों ने लिखा है, ‘हम बेहद कष्ट के साथ आपके समक्ष यह मुद्दा उठाना चाहते हैं कि अदालत की ओर से दिए गए कुछ फैसलों से न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके अलावा उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता भी प्रभावित हुई है। इसके अलावा भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय के कामकाज पर भी असर पड़ा है।’

जजों ने पत्र में आगे लिखा है, ‘स्थापना के समय से ही कोलकाता, बॉम्बे और मद्रास हाई कोर्ट में प्रशासन के नियम और परंपरा तय थे। इन अदालतों के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने विपरीत प्रभाव डाला है, जबकि शीर्ष अदालत की स्थापना तो खुद इन उच्च न्यायालयों के एक सदी के बाद हुई थी।’

पत्र में कहा गया है कि, ‘सामान्य सिद्धांत है कि चीफ जस्टिस के पास रोस्टर तैयार करने का अधिकार होता है और वह तय करते हैं कि कौन सी बेंच और जज किस मामले की सुनवाई करेगी। हालांकि यह देश का न्यायशास्त्र है कि चीफ जस्टिस सभी बराबर के जजों में प्रथम होता है, न ही वह किसी से बड़ा और न ही छोटा होता है।’

जजों ने अपने पत्र में आगे लिखा है, ‘ऐसे भी कई मामले हैं, जिनका देश के लिए खासा महत्व है। लेकिन, चीफ जस्टिस ने उन मामलों को तार्किक आधार पर देने की बजाय अपनी पसंद वाली बेंचों को सौंप दिया। इसे किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।’

चिट्ठी में आगे लिखा गया है कि ‘इस संस्था को शर्मिंदगी से बचाने के लिए हम उन मामलों का जिक्र नहीं कर रहे हैं लेकिन उपरोक्त दोनों नियमों से उल्लंघन के कारण कुछ हद तक इस संस्था की छवि को नुकसान हो चुका है।’

पत्र में आगे कहा गया है कि, ‘उपरोक्त संदर्भ में हम आपको आरपी लूथरा बनाम भारत सरकार के मामले में 27 अक्तूबर के आदेश के बारे में बताना उचित समझते हैं जिसमें कहा गया है कि व्यापक जनहित में मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर को अंतिम रूप देने में तनिक भी विलंब नहीं किया जाना चाहिए।’

चारों जजों द्वारा चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को लिखे गए पत्र में आगे लिखा गया है कि, ‘जब मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसिजर का मामला पहले से ही संविधान पीठ के पास है तो यह समझना मुश्किल है कि कोई दूसरी पीठ कैसे इस पर सुनवाई कर सकती है।’

 

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