इन पांच मुस्लिम भाइयों की अगुवाई में निकली अयोध्या की शोभायात्रा, श्रद्धालुओं ने उनके पैर छूकर लिया आशीर्वाद

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मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में बुधवार (18 अक्टूबर) को ऐतिहासिक दिवाली मनाई गई। ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष और हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा के बीच सरयू तट पर 1 लाख 87 हजार 213 दीये जलाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया गया। इस दौरान अयोध्या के साकेत डिग्री कॉलेज से रामकथा पार्क तक तीन किलोमीटर की दूरी के बीच यह भव्य शोभायात्रा निकाली गई।

PHOTO: Times of India

दिवाली के एक रोज पहले इस भव्य आयोजन ने अयोध्यावासियों को कुछ वैसी ही याद दिलाई, जब पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबित, अयोध्या में तीन किलोमीटर की भगवान राम की शोभा यात्रा की अगुवाई एक ही परिवार के पांच मुस्लिम भाई कर रहे थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, दिवाली के मौके पर निकाली गई इस शोभायात्रा में सबसे आगे पांचों मुसलमान भाई ही चल रहे थे। इन भाइयों में एक ने भगवान राम की सेना के वानरों का रूप धर रखा था। इन पांचों भाइयों पर लोगों ने पुष्पवर्षा की और उनके पांव छूकर आशीर्वाद लिया।

सबसे आगे थे पांचों भाई

रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के दौसा जिले में बांदीकुईं के रहने वाले शमशाद और उनके चार भाई फरीद, सलीम, अकरम और फिरोज बहरूपिया समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में जब त्रेतायुग जैसी दिवाली मनाने के तहत अयोध्या में शोभायात्रा निकली, तो यह पांचों भाई सबसे आगे थे।

इस शोभायात्रा में शमशाद वानर सेना के सदस्य थे, जबकि उनके भाई फरीद ने भगवान शिव का किरदार निभाया था। इसके अलावा उनके बाकी तीन भाइयों में सलीम ने हनुमान, सबसे छोटे भाई अकरम ने भगवान कृष्ण और सबसे बड़े भाई फिरोज ने राक्षस का भेष रचा।

यह पांचों भाई उस शोभायात्रा का हिस्सा थे, जिसने भगवान राम की 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या पहुंचने पर अगवानी की। इस दौरान श्रद्धालुओं ने इन पांचों भाईयों का पैर छूकर आशीर्वाद लिया और तस्वीरें भी खींचीं। शोभायात्रा में सबसे आगे चल रहे अमित और रवि वर्मा ने भगवान राम और लक्ष्मण का भेष धारण किया हुआ था।

शिव का किरदार निभाने वाले फरीद ने अखबार से बातचीत में कहा कि हमारा परिवार कई पीढ़ियों से रामलीला में शामिल होता रहा है, लेकिन यह पहला मौका है, जब हमें अयोध्या बुलाया गया। हमें यकीन है कि अगर इसी तरीके से हमारे देश की परंपरा को मनाया जाएगा, तो हम अपनी खोती हुई संस्कृति को पुनर्जीवित कर सकेंगे।

 

 

 

 

 

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