आधी रात दिल्ली में प्रवेश की इजाजत मिलने के बाद किसानों ने वापस लिया आंदोलन

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हरिद्वार से किसान क्रांति यात्रा लेकर दिल्ली पहुंचे किसानों ने आखिरकार अपना मार्च वापस ले लिया है। सारे किसान दिल्ली-यूपी बॉर्डर से रात में ही पहले किसान घाट आए और उसके बाद अब किसान घाट से आंदोलन खत्म करके घर लौट रहे हैं। किसानों ने अपनी किसान क्रांति पदयात्रा खत्म करने का ऐलान करते हुए कहा कि उनकी ज्यादतर मांगें सरकार ने मान ली है।

डीसीपी (ईस्ट) पंकज सिंह ने बताया कि करीब पांच हजार किसानों को आधी रात दिल्ली में अंदर आने की इजाजत दी गई। वे सभी निर्धारित जगह किसान घाट पहुंचे और सुबह छह बजे तक वहां से वापस अपने घर लौट गए। इससे पहले, मंगलवार की सुबह करीब साढ़े ग्यारह बजे दिल्ली-यूपी गेट के पास एनएच-24 पर राजधानी के अंदर दिल्ली पुलिस से इजाजत नहीं मिलने के बाद प्रदर्शनकारी किसानों और सुरक्षाबलों में हुई हिंसक झड़प हुई। इस घटना में पुलिसकर्मी और किसान समेत करीब 20 लोग घायल हुए।

दिल्ली में प्रवेश की इजाजत मिलने के बाद भारतीय किसान संघ (बीकेयू) के प्रमुख नरेश टिकैत की अगुआई में हजारों किसान 200 से अधिक ट्रैक्टरों पर सवार होकर किसान घाट पहुंचे। टिकैत ने इसे किसानों की जीत बताया। उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार अपने उद्देश्यों में विफल रही है। टिकैत ने कहा कि “सभी कठिनाइयों के बावजूद किसान जुटे रहे। हम अब 12 दिनों से मार्च कर रहे हैं। किसान थके हुए हैं। उन्होंने कहा कि हम सरकार से अधिकारों की मांग जारी रखेंगे, लेकिन अब हम पदयात्रा खत्म कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि किसान बुधवार को सुबह जल्दी लौट जाएंगे। उत्तर प्रदेश-दिल्ली सीमा पर सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बीच किसानों को प्रशासन ने दिल्ली में प्रवेश की अनुमति दे दी। इससे वे राष्ट्रीय राजधानी तक की अपनी तय यात्रा पूरी कर सके। बीजेपी के विरोध में नारेबाजी करते हुए किसान बुधवार को रात में लगभग दो बजे किसान घाट पहुंचे।

इससे पहले मंगलवार को हजारों किसानों की पदयात्रा को पुलिस ने दिल्ली-यूपी की सीमा पर रोक दिया था। इस दौरान पुलिस के बल प्रयोग से कुछ किसान घायल भी हो गए। किसानों ने अपनी 15 मांगें सरकार के सामने रखीं जिनमें कर्ज माफी और फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांगें भी शामिल हैं। इन मांगों को अविलंब पूरा किए जाने का आश्वासन सरकार की ओर से दिया गया। आंदोलनकारी किसानों ने 10 दिन पहले हरिद्वार से पदयात्रा शुरू की थी।

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