हिन्दुत्व के मुखौटे के पीछे छिपें फर्जी देशभक्त

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सदियों पहले जब हमें धर्म ने नहीं बाँटा था, तब तक हिन्दू होना विश्वास का कारण नहीं बल्कि सिन्धु नदी के इस पार रहने वाले लोगों के लिए एक भौगोलिक सम्बोधन था। क्योंकि फ़ारसी लोग ‘स’ का ठीक तरह से उच्चारण नहीं कर सकते थे इसलिए उनके लिए सिन्धु शब्द हिन्दू हो गया।

हिन्दुत्व

भारतीय उपमहाद्वीप के मूल निवासी आर्य (आर्यन) अपने धर्म को वैदिक धर्म या मानव धर्म कहते थे। उनका धर्म किन्ही विशेष नियमों या धार्मिक बन्धनों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित सनातन धर्म समस्त मानव जाति के लिए था। प्राचीन लोगों के लिए हिन्दू या हिन्दुत्व बिल्कुल एक अनजान शब्द था। हमारे सभी पुरातन व पवित्र धर्म ग्रंथ मानव धर्म के बारे में सिखाते हैं कि मानव जाति को किस तरह का जीवन जीना चाहिए। इस प्रकार फ़ारसी लोगों ने भारत के मूल निवासियों के लिए हिन्दू शब्द का प्रयोग किया। बाद में मुगलों और अंग्रेजों ने गैर-मुस्लिम सभी भारतीय मूल के निवासियों के लिए हिन्दू शब्द का प्रयोग किया।

कालांतर में 18वी शताब्दी में महान समाज सुधारक राजा राम मोहन राय ने हिन्दू शब्द का हिन्दू धर्म के रूप में व्यापक प्रचार किया। हिन्दुत्व ने सनातन धर्म की सभी स्थानीय धार्मिक परम्पराओं को अपने मे समाहित कर गले लगाया और सनातन धर्म में प्रचलित मान्य ईश्वर के स्वरूपों राम, कृष्ण, विष्णु, शिव, हनुमान, दुर्गा, लक्ष्मी और अन्य देवी देवताओं की पूजा अर्चना की। हिन्दुत्व का कोई एक संस्थापक ना होने के कारण यह धर्म समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए परम सत्य पर आधारित ईश्वर की परिकल्पना को स्थापित करता है। बीते हजारों वर्षों में महान सन्तों और देवीय विभूतियों के वचनों व उपदेशों से हिन्दुत्व दिनों-दिन और समृद्ध होता गया।

हमारे पवित्र ग्रंथ वेद और उपनिषद ही सनातन धर्म या आधुनिक हिन्दुत्व की नींव हैं। इस लिए हिन्दू होना किसी एक देवता में विश्वास करना नहीं, बल्कि सत्य पर आधारित ईश्वरीय आस्था में विश्वास करना है। हिंदू धर्म एक विश्वास है जिसमें अधिकतर भारतीय विश्वास करते हैं और सदियों से इसके धर्म निरपेक्ष स्वरूप को बचाकर रखे हुए है। इस लिए हमारे देश में विभिन्न मतों और धार्मिक मान्यताओं को मानने वालों में कभी कोई मतभेद नहीं रहा है। सांस्कृतिक, भाषाई एवं धार्मिक विभिन्नताएं इस देश को एकता में अनेकता का रूप देती रही।

सिन्धु क्षेत्र में रहने वाले लोग बाहरी आक्रमणों के खिलाफ मज़बूती से खड़े रहे और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को बचाकर रखा। हमारे पूर्वज मुगलों और अंग्रेजों के द्वारा अनेक घाव दिए जाने के बाद भी झुके नहीं और अपने अस्तित्व को मिटने नहीं दिया। परंतु आजादी के 70 साल बाद हम एक महान राष्ट्र की छाया भर रह गए हैं। आजकल हम ग़रीबी और भूख से उतना नहीं लड़ रहे जितना कि धार्मिक कारणों के लिए। आजकल हमारी लड़ाई बिना किसी वास्तविक कारण के पहनावे जैसे ऊपरी दिखावे के लिए दिखाई देती है।

हे राम !

महात्मा गांधी के आदर्श भारत के राम राज्य की कल्पना को पूरी दुनिया जानती है। प्यार से जिन्हें पूरा भारत ‘बापू’ बुलाता है, उनकी मृत्यु शायद हमारे धर्म और विश्वास की सबसे बड़ी हार और दुर्घटना है। उन्होंने अपना सारा जीवन सच्चे हिन्दुत्व का पालन करने के लिए न्योछावर कर दिया और अपने अन्तिम समय तक राम का नाम लेते हुए इस संसार से विदा हुए। यह कितने दुर्भाग्य और दुख की बात है कि उनकी हत्या एक हिंदू नाथूराम गोडसे के द्वारा की गयी। वास्तव में वह हिन्दुत्व से पथ- भ्रष्ट एक अतिवादी संगठन एवं विकृत मानसिकता वाला व्यक्ति था तभी तो उसने ऐसा काम किया।

गोडसे दो अतिवादी संगठनों – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा से जुड़ा हुआ था। यद्यपि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका इस घटना से कभी सिद्ध नहीं की जा सकीं लेकिन उनके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिन्दू महासभा, शिवसेना और बजरंग दल जैसे हिन्दू संगठन हिन्दुत्व की आड़ में असली हिन्दू धर्म जो राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और सर्व पल्ली राधाकृष्ण के विचारों के विपरीत प्रतीत होते हैं।

विनायक दामोदर सावरकर ने जीवन भर हिन्दुत्व का प्रचार किया और हिन्दू व हिन्दुत्व में अन्तर स्पष्ट किया। सावरकर ने 1923 में एक पेपर द्वारा अपनी विचारधारा को इस प्रकार स्पष्ट किया ‘हिन्दुत्व – एक हिंदू कौन है।’ वह लिखते हैं कि जो हिन्दू भूमि पर रहता है वह हिन्दू है इस प्रकार हिमालय से हिंद महासागर तक फैली भूमि पर रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है। उनके अनुसार प्रत्येक धर्म जिनकी जड़ें हिन्दुस्तान में हैं हिन्दुत्व से परिपूर्ण हैं जैसे कि बुद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्म हैं। इस प्रकार हिन्दुत्व शब्द किसी एक धर्म की ओर इशारा नहीं करता है।

राम राज्य का मज़ाक

महात्मा गाँधी के विचारों का भारत कोई खोखले आर्थिक या राजनीति विचारों पर आधारित नही था बल्कि राम राज्य के नियमों पर स्थापित था जहाँ पर धर्म के बारे में विशुद्ध भारतीय मूल्यों पर देश आगे बढ़ता । ऐसे राज्य लोगों की संप्रभुता और शुद्ध नैतिक अधिकार के आधार पर शासन की व्यवस्था होती।

कैसी विडंबना है की राम राज्य की पैरवी करने वाले आज राम के आदर्शों का उल्लंघन कर रहे हैं। दलित शबरी के हाथों फल ग्रहण करने वाले श्री राम मानवता और समानता के हकदार थे। उन्होने ग़रीब केवट को उसकी सादगी और भक्ति के लिए गले लगाया। पुरातन काल में जातियों का विभाजन कार्य-कौशल पर आधारित था- धर्म पर नही। आज उनकी जनम भूमि अयोध्या में जो धर्म के नाम पर खून बह रहा है, वह श्री राम को कभी स्वीकार ना होता बल्कि उन्हे अत्यंत दुख देता। इस युग में जाति और धर्म के नाम पर आधुनिक भारतीय समाज का खुलेआम संहार हो रहा है।

आक्रामक राष्ट्रवाद

इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो, कोई भी “बाहरी” या “विदेशी” तत्व भारतीय संस्कृति का अंश नहीं है। सही भी है। पर क्या यह सोच सनातन धर्म की शिक्षा के विपरीत नहीं है? जातिवाद और धर्मवाद की अंध भक्ति के चलते, हिन्दू आदर्शवाद की जगह हिंदुतत्व समर्थक विचार ले रहे हैं। हिंदुतत्व एक विचारधारा मात्र है, हिन्दू धर्म नहीं। विश्व के किसी भी और घर्म से अधिक निरपेक्षता, सौहार्द और सर्व-धर्म सम्मान की शिक्षा हमें हिन्दू धर्म से मिलती है। लेकिन हिंदुत्व कि आड़ में कहीं हिंसक हिन्दू राष्ट्रभक्ति को बढ़ावा तो नहीं मिल रहा है?

नाथूराम ने महात्मा गाँधी की हत्या उनके मुस्लिम प्रेम के कारण की। गांधी जी की हत्या और भारत के विभाजन ने हिन्दू-मुस्लिम रिश्ते को भारी आघात पहुँचाया है। और आज भी राजनीतिज्ञ और धार्मिक कट्टरपंथी इसी आग को भड़काने में लगे हैं।

हिंदुत्व विचारधारा के ज़ोर पकड़ते, धर्मनिरपेक्षता के पाँव उखड़ रहे हैं। अफसोस की बात है कि सदियों से चले आ रहे हिन्दू दमन के कारण घृणा और सांप्रदायिकता बढ़ रही है । धर्मान्ध हिन्दू संगठन इसका फायदा उठा रहे हैं। यही कट्टरपंथी भारतीय धर्म निरपेक्षता के लिए खतरा बन रहे हैं। अल्पसंख्यकों को सांप्रदायिकता का निशाना बनाया जा रहा है। भूतकाल में हुए विदेशी अतिक्रमण को कारण बना कर आपसी सौहार्द को खत्म किया जा रहा है। चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, सभी भारतीय नागरिक एक समान हैं और अपने-अपने धर्म-पालन की स्वतंत्रता रखते हैं।

सांस्कृतिक शुद्धिकरण या धर्म निरपेक्षता को ख़तरा

कट्टरपंथी हिंदुत्व के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच के कारण तथाकथित सांस्कृतिक शुद्धिकरण को धर्म निरपेक्षता के लिए धार्मिक कट्टरवाद का बढ़ता हुआ ख़तरा माना जाता है। बाबरी मस्जिद विध्वंस, गोधरा नरसंहार, ईसाइयों पर हमले और घर-वापसी जैसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं। संघ की पैरवी ने साम्प्रदायिक दंगों को जन्म दिया जिसमें हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह तर्क देकर अल्पसंख्यकों के प्रति दुर्भावना फैला रहा है कि भूतकाल में उन लोगों ने हमारी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दू एकता के नाम पर मुस्लिमों और दूसरे अल्पसंख्यकों को अलग थलग करते हुए दलितों का दमन कर रहा है।

ऐसे कार्यों से दक्षिण-पंथी कट्टर हिंदू संविधान में दिए गये बराबरी के मौलिक सिद्धांतों का खुल्लम-खुल्ला उलंघन कर रहे हैं और अपने कार्यों को न्यायोचित भी बता रहे हैं। छद्म धर्म निरपेक्ष कट्टर हिंदू अपने अनुसार धर्म को विभाजित कर रहे हैं। हिंदुत्व को मुस्लिम या ईसाई अल्पसंख्यकों से ख़तरा नहीं बल्कि अपने अंदर से पैदा हुए स्वयंभू धर्म के ठेकेदारों के द्वारा धर्म और संस्कृति के नाम पर बनाई गयी सेना से है।

सच्चा हिन्दू और हिन्दुस्तानी होना

जो लोग दूसरे धर्मो को हिन्दुत्व के लिए खतरा मानते हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि हिन्दू धर्म को अपने अस्तित्व के लिए किसी राजनीतिक बैसाखी की जरूरत नहीं है और न ही हिन्दू धर्म ने अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए कभी ऐसे लोगों पर निर्भर किया है । हिन्दुत्व एक स्वयं पोषित वृक्ष के समान है जिसकी जड़ें मानवता रूपी मिट्टी में गहराई तक जाती हैं तथा यह शास्वत सत्य से पोषित एक ऐसा आघ्यात्मिक मार्ग है कि जो परम ईश्वरीयता की ओर ले जाता है। इसलिए हिन्दुत्व के अनुसार कोई भी व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलकर मोक्ष अथवा ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।

जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने समक्ष समस्त भय, राग व द्वेष का परित्याग करने का उपदेश दिया था। वास्तव में एक सच्चा हिन्दू दूसरे के विश्वास को नीचा दिखाकर अपनी श्रेष्ठता स्थापित नहीं करता है। सनातन धर्म हमें वही प्राप्त करना सिखाता है जो उचित और न्यायसंगत हो और जो दूसरों पर अन्याय या जबरदस्ती करके न प्राप्त किया जाए। चाहे उनका धार्मिक विश्वासहमसे कितना भी अलग क्यों न हो।

हिन्दू होना मुसलमान या ईसाई विरोधी होना नहीं है। ना ही हिन्दू होने का अर्थ है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या बजरंग दल का समर्थक होना या उनके द्वारा चलाए जा रहे धर्मान्ध अभियानों का समर्थक होना । हिंदू राष्ट्र में केवल हिंदू ही रह सकें, यह तो एक अंधकारमय युग होगा। हमारा उद्देश्य स्वतन्त्रता और उत्पीड़न से मुक्ति है, न की एक मुसलमान-मुक्त भारत।

धर्म राजनीति के हाथों की कठपुतली नहीं है और राजनीति की धार्मिक भावनाओं से खेलने का अधिकार नहीं है। अपनी संस्कृति और परंपरा का पालन करने वाले हिंदू जानते हैं की सर्व-धर्म सम्मान ही हमारे धर्म का आधार है। यदि हम धार्मिक कट्टरपंथियों को अपना आचरण या पहनावा तय करने देते हैं, तो हम उनके विचारों के गुलाम बनते हैं।

भारत की प्रगति एक धर्म-निरपेक्ष जनतंत्र होने में है। आज संपूर्ण विश्व की दृष्टि हम पर केंद्रित है -अराजकता में स्थिरता देखने के लिए। संकुचित विचारधारा भारत की आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उन्नति में बाधा है। धर्म-रूपी मुखौटे के पीछे छिप कर हम पुरातन काल से चले आ रहे सांस्कृतिक बहुलवाद को क्षतिग्रस्त कर रहे हैं। अल्पसंख्यकों से मिलकर हमारा राष्ट्र पूर्ण होता है, क्योंकि उनके बिना, हम दूसरा पाकिस्तान होंगे।

 

2 COMMENTS

  1. AAP Express ?? ‏@AAPExpress 10h10 hours ago
    सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दी गईं दलीलें ‘पंचायत को पावर है तो दिल्ली सरकार को क्यों नहीं?’ Next Hearing 14 Feb pic.twitter.com/IaegHHSdqG

  2. Every people know u Guy’s work only for an agendas? Don’t think Indian people are fool…See..what happenings in Kashmir ..how they forced & murdered Hindu..

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