मनमोहन सिंह ने पीएम मोदी की नोटबंदी को बताया ‘विशाल त्रासदी’ अपने लेख में कड़े शब्दों में की आलोचना

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संसद में 24 नवंबर को पूर्व प्रधानमंत्री और जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह ने नोटबंदी पर बोलते हुए इस फैसले को ‘संगठित लूट, कानूनी लूट’ कहा था। अब एक बार फिर मनमोहन सिंह ने बेहद कड़े शब्दों में नोटबंदी की आलोचना करते हुए इसे बड़ी त्रासदी बताया है।

मनमोहन सिंह

दा हिंदू को अपने संपादकीय लेख में पूर्व प्रधानमंत्री ने लेख में नोटबंदी पर अपने स्पष्ट विचार रखें हैं।

गलत आधार

प्रधानमंत्री के 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटो को रातोरात बंद करने वाले फैसले के पीछे काले धन को बाहर लाने का मूल आधार एक वहम लगता है। ये वास्तविकता से दूर है।

भारतीयों का एक विशाल समूह कमाई नकदी में करता है, ऐसे नोटों को कालाधन करार दिया गया और करोड़ों गरीब लोगों की जिंदगियों को अधर में डाल दिया गया, ऐसे में यह एक बड़ी त्रासदी है। अधिकतर भारतीय वैध तरीके से अपनी आय, लेन-देन और बचाना भी पैसों में ही करते है। ऐसे में संप्रभु राष्ट्र की लोकतांत्रिक तौर पर चुनी हुई सरकार का यह मौलिक कर्तव्य बनता है कि वे अपने नागरिकों के अधिकार और उनकी जीविका की रक्षा करे। हाल में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का जो फैसला लिया है, वह मौलिक कर्तव्य का उपहास है।

जीवन अव्यवस्था में किया
ऐसा कहा जाता है, ‘पैसा एक विचार है, जो आत्मविश्वास को प्रेरित करता है।’ 8 नवंबर 2016 की आधी रात को लगे एक झटके ने करीब एक अरब से भी ज्यादा लोगों के विश्वास को हिला कर रख दिया।

प्रधानमंत्री मोदी के इस फैसले के चलते एक रात में ही 500 और 1000 रुपए के रूप में मौजूद देश की 85 फीसद मुद्रा बेकार हो गई। एक जल्दबाजी के फैसले में प्रधानमंत्री ने करोड़ों भारतीयों के विश्वास को चकनाचूर करके रख दिया, जो मानते थे कि भारत सरकार उनकी और उनके पैसों की रक्षा करेगी।

प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को किए अपने संबोधन में कहा, ‘किसी देश के इतिहास में एक वक्त ऐसा आता है, जब उसके विकास के लिए मजबूत और निर्णायक कदम की आवश्यकता पड़ती है।’ और इस फैसले के लिए पीएम ने दो महत्वपूर्ण कारण गिनाए।

पहला कारण था- ‘सीमा पार से आ रहे आतंकियों की तरफ से किए जा रहे फर्जी नोटों के इस्तेमाल को रोकना’ और दूसरा कारण था- ‘भ्रष्टाचार और कालाधान पर अंकुश लगाना।’ ये दोनों ही उनके उद्देश्य सम्मानजक और पूरे दिल से माने जाने वाले हैं। फर्जी नोट और कालाधन ठीक उसी तरह से भारत के लिए खतरा है, जैसा आतंकवाद और सामाजिक बंटवारा।

लेकिन, प्रधानमंत्री का 500 और 1000 के नोटों को अवैध करार देने से ठीक ऐसा लगता है जैसे सभी पैसे कालाधन है और सभी काला धन पैसों के रूप में है।

अनायास नतीजे

डॉ सिंह द्वारा लिखित संपादकीय आलेख ‘विशाल त्रासदी की रचना’ में भविष्यवाणी की गई है कि नोटबंदी की वजह से जीडीपी और नौकरियों के सृजन में काफी दूर तक प्रभाव पड़ेगा, और आने वाले महीनों में ‘बेवजह’ कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। इस फैसले की वजह से ईमानदार हिन्दुस्तानियों को ‘भारी नुकसान’ होगा, और बेईमान और काला धन जमा करने वाले ‘हल्की-सी चोट के बाद’ बच निकलेंगे।

काला धन भारत में एक वास्तविक चिंता का विषय है। यह वो धन है, जो कई वर्षों के दौरान गुप्त आय के स्त्रोत से कमाया गया है। गरीबों के विपरीत कालाधन जमा करने वालों का धन कई रूपों में है जैसे जमीन, सोना और विदेशी लेन-देन। इससे पहले कई सरकारों ने पिछले दशकों में आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई और योजनाओं के माध्यम से अवैध धन को निकलवाने का प्रयास किया है।

 

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