11 साल की सुनवाई और 2 मिनट में फैसला

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साल 2002 की बात है तब हम अंसल प्लाज़ा के सामने वाली कॉलोनी में रहते थे छोटी दिवाली का दिन था, मैं छत पर खड़ी थी की तभी सामने से गुजर रही सड़क पर अचानक गहमागहमी सी बढ़ गई। मैं नीचे आई और मम्मी से इस बारे में बात ही कर ही रही थी कि पता चला घर के सामने हाल ही में बने अंसल प्लाज़ा में एनकाउंटर हुआ है। किसी ने कुछ कहा सुना तो नहीं पर कॉलोनी में कुछ बातें होने लगी वो क्या बातें थी पता नहीं सुबह होते होते किसी ने बताया कि एनकाउंट राजबीर सिंह अंकल ने किया है जिनका घर हमारे घर से दो चार ब्लाक छोड़ कर ही था।

दिवाली आई और चली गई इसके बाद कभी सरोजनी नगर और तो कभी बटला हाउस की ख़बरे सामने आई लेकिन जाने क्यों अंसल प्लाज़ा का वो एनकाउंटर मेरे ज़ेहन में बैठ गया। मेरे घर के इतने क़रीब एनकाउंट हुआ था मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि हमारे घर के क़रीब भी कुछ ऐसा हो सकता है हालांकि बाद में एनकाउंटर पर भी सवाल उठे। बहरहाल बात आई गई लेकिन पिछले साल जब कश्मीर के मोहम्मद रफ़ीक़ शाह के बारे में पढ़ा तो बेहद अफ़सोस हुआ। रफ़ीक को दिल्ली में 2005 में हुए बम धमाकों के बाद गिरफ़्तार किया गया था और पिछले साल उन्हें बरी कर दिया गया, 12 साल लग गए रफ़ीक़ की बेगुनाही को साबित होने में।

न्याय तो मिला लेकिन देरी से… मैंने कहीं पढ़ा था कि देरी से मिले न्याय की कोई क़ीमत नहीं होती। देश में क़ानून व्यवस्था के हालात किसी से छुपे नहीं है लेकिन 12 जनवरी 2018 की तारीख़ इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई क्योंकि इस दिन देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने मीडिया को संबोधित करते हुए कई सवाल उठाए और देश में लोकतंत्र को ख़तरे में बताया। सुप्रीम कोर्ट के जजों का ऐसा क़दम देश की क़ानून व्यवस्था के सिस्टम को समझने के लिए काफ़ी है।

हाल ही में एक केस मेरी नज़र से गुज़रा जिसने मेरे जैसे क़ानून के मामले में ‘गंवार’ इंसान को भी कुछ बातों को समझने की जिज्ञासा पैदा कर दी- ये मामला मेरे सामने सामाजिक संगठन ‘रिहाई मंच’ के ज़रिए आया। मामला साल 2007 में लखनऊ कचहरी में हुए बम ब्लास्ट से जुड़ा है जिसमें दो आरोपियों तारिक कासमी और मोहम्मद अख़्तर को 23 अगस्त को दोषी करार दिया गया, मैं इस पूरे मामले में जिस तरह से कार्यवाही हुई उसे समझना चाहती हूं क्योंकि ये केस क़ानूनी नज़र से ज़्यादा सियासी अहमियत रखता है।

2007 के इस मामले में तारिक कासमी, ख़ालिद मुजाहिद, सज्जादुर्रहमान, अख्तर वानी और आफ़ताब आलम अंसारी को पकड़ा गया। जिनमें आफ़ताब आलम अंसारी को 22 दिन में क्लीनचिट मिल गई, सज्जादुर्रहमान को 2011 में बरी कर दिया गया जबकि तारिक कासमी और ख़ालिद मुजाहिद की गिरफ़्तार पर आर डी निमेष की अध्यक्षता में ‘निमेष आयोग’ का गठन किया और जिसकी रिपोर्ट आने पर जमकर हंगामा और सियासत हुई।

रिपोर्ट में तारिक कासमी के साथ जिस ख़ालिद मुजाहिद की गिरफ़्तार को संदिग्ध बताया गया था उसकी इस दौरान संदिग्ध हालात में मौत हो गई। मामला बढ़ा तो केस के वक़्त एडीजी लॉ एंड आर्डर रहे बृजलाल (जो अब यूपी में अनुसूचित जाति और जनजाती आयोग के अध्यक्ष हैं जो अपने आप में एक सवाल है) डीजीपी विक्रम सिंह और दूसरे सहयोगियों के खिलाफ़ मामला दर्ज करवाया गया।

कुछ सवाल 

  • ख़ैर, ये तो कुछ बातें थी जो केस को समझने के लिए बताना ज़रूरी था लेकिन अब यू टर्न लेकर उसी पॉइंट पर आते हैं जहां से केस बताना शुरू किया था। तो जैसा की मैंने कहा था कि मैं ये केस समझना चाहती थी तो सबसे पहले मैंने ये जानना चाहा कि जिस केस में पिछले 11 साल से सुनवाई चल रही थी उसपर जज साहिबा ने महज़ दो मिनट में चुटकी बजाकर फैसला कैसे सुना दिया? और अगर मामला इतना ही सीधा था तो फिर 11 साल क्यों ख़र्च किए?
  • साथ ही कोई क़ानून का जानकार क्या मुझे बताएगा कि ये कैसी सुनवाई थी, जहां कोई दलील सुने बग़ैह ही फ़ैसला कैसे सुना दिया गया, क्या वाकई ऐसा होता है?
  • इस केस की लंबी सुनवाई जिस जज के अंडर हो रही थी उनका अचानक लखनऊ में ही दूसरे कोर्ट में ट्रांसफ़र क्यों दिया गया?
  • अब ज़रा उस दिन (23 अगस्त) पर भी नज़र डालते हैं जैसे की मुझे बताया गया कि हर सुनवाई के दौरान जज साहिबा सुबह 11 बजे ही आ जाती थीं लेकिन उस दिन वो क़रीब 3 बजकर 40 मिनट पर जेल में (जहां सुनवाई हो रही थी) स्थित अपने चेंबर में आई और क़रीब चार बजे आकर फ़ैसला सुनाया और दोबारा अपने चेंबर में चली गई (वाह! केस चल रहा है या फिर जॉली एलएलबी का कोई सीन)

बहरहाल, सवालों की लिस्ट बहुत लंबी है जो इस केस को भी दूसरे केस की तरह ही बोरिंग बना देगी। जो केस कोर्ट में चल रहे होते हैं उनपर टीका टिप्पणी नहीं की जाती और जो देश के गुनहगार हैं उन्हें सख़्त से सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए लेकिन क़ानूनी लड़ाई लड़ने का हक़ तो सभी को है। हम हॉल में जाकर कोर्ट कचहरी और उसकी कार्यवाही पर बनी फ़िल्म ‘संजू’ देखकर बॉक्स ऑफ़िस कलेक्शन बढ़ाने में तो अपना पैसा ख़र्च करना चाहते हैं लेकिन क़ानून की किबातों की तरह लंबे और रद्दी केसों में दिलचस्पी नहीं रखते।

मिर्च मसाला लगाकर अगर किसी केस को ‘जॉली एलएलबी’ ह्यूमर क्रिएट करता है तो हम ताली बजाते हैं लेकिन जब दिल्ली के सरोजनी नगर में हुए ब्लास्ट केस में फंसे किसी रफ़ीक़ की बेगुनाही साबित होती है तो चाह कर भी उसकी जवानी के वो 12 साल उसे नहीं लौटा पाते जो उसने 12 सदियों की तरह जेल में और उसके मां बाप ने समाज नाम के जेल में भोगे।

(लेखक पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘जनता का रिपोर्टर’ उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार ‘जनता का रिपोर्ट’ के नहीं हैं, तथा ‘जनता का रिपोर्टर’ उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।)

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