सीबीआई विवाद: आलोक वर्मा मामले में सरकार को करना पड़ सकता है शर्मिंदगी का सामना, CVC जांच में नहीं मिला कुछ ठोस सबूत!

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छुट्टी पर भेजे गए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक आलोक कुमार वर्मा के खिलाफ चल रहे केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की जांच में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आलोक वर्मा के खिलाफ जांच कर रही सीवीसी के हाथ ‘खाली’ रहने की बात सामने आ रही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की मानें तो सूत्रों के मुताबिक, सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा पर लगे 2 करोड़ रुपये की घूस लेने के आरोपों की जांच कर रही सीवीसी को कुछ ठोस नहीं मिला है। आपको बता दें कि सीवीसी की जांच सुप्रीम कोर्ट के जज ए. के. पटनायक की देखरेख में होने की बात कही गई थी। मामले की जांच सरकार ने ही सीवीसी को सौंपी थी।इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने जस्टिस पटनायक को उसका प्रमुख बनाया था।

दरअसल, इस समय देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई खुद सवालों के घेरे में आ गई है। सीबीआई के दो सीनियर अधिकारी (सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना) एक दूसरे के ऊपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। सीबीआई में आतंरिक कलह के मद्देनजर मोदी सरकार ने 23 अक्टूबर को अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सीबीआई निदेशक आलोक कुमार वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया था।

वहीं, संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को तत्काल प्रभाव से अंतरिम निदेशक नियुक्त कर दिया है।  सीबीआई के अंदरखाने की यह लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट के दर पर पहुंच चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी को निर्देश दिया था कि आलोक वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच दो सप्ताह के भीतर पूरी की जाए। यह जांच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ए के पटनायक की निगरानी में हो रही है। मामले की अगली सुनवाई 12 नवंबर को होगी।

अखबार के मुताबिक, सीवीसी ने शुरुआती जांच की रिपोर्ट को शुक्रवार (9 नवंबर) को पूरा कर लिया है। इसे फाइनल करके सोमवार यानी 12 नवंबर को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को सौंप दिया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, इसमें राकेश अस्थाना द्वारा दिए गए विभिन्न सबूतों की जांच हुई है। जिसमें अस्थाना द्वारा लगाए गए आरोपों में कुछ भी ठोस सामने नहीं आया है।

जांच में सीवीसी के. वी. चौधरी और विजिलेंस कमिश्नर शरद कुमार और टी. एम. भसीन शामिल थे। सूत्र से जब पूछा गया कि क्या अस्थाना पर लगे आरोप शुरुआती तौर पर सही साबित हुए हैं? तो जवाब मिला कि सीवीसी का काम बस वर्मा पर लगे आरोपों की सच्चाई जानना है। इस रिपोर्ट के आधार पर ही तय होगा कि वह फिर सीबीआई की टॉप पोस्ट पर बैठेंगे या नहीं।

क्या है पूरा मामला?

आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच पिछले कुछ दिनों से आरोप-प्रत्यारोंपों का सिलसिला चल रहा था। वर्मा और अस्थाना के तल्ख रिश्तों की शुरुआत पिछले साल अक्टूबर में तब हुई जब सीबीआई डायरेक्टर ने अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर प्रमोट किए जाने पर आपत्ति जताई। अस्थाना ने बाद में वर्मा के खिलाफ मीट कारोबारी मोइन कुरैशी के सहयोगी सतीश बाबू सना से 2 करोड़ रुपये लेने का आरोप लगाया। राकेश अस्थाना ने वर्मा के खिलाफ कैबिनेट सचिव को 24 अगस्त को शिकायत दी थी। कैबिनेट सचिव ने अस्थाना की शिकायत को सीवीसी को बढ़ा दिया था।

उधर, इस विवाद में उस समय नया मोड आया जब 15 अक्टूबर को सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक अस्थाना, उप अधीक्षक देवेंद्र कुमार तथा कुछ अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली। अस्थाना पर मांस कारोबारी मोइन कुरैशी के मामले के सिलसिले में तीन करोड़ रुपये रिश्वत लेने का आरोप है। कथित रिश्वत देने वाले सतीश सना के बयान पर यह केस दर्ज किया गया था। FIR में अस्थाना पर उसी सतीश बाबू सना से 3 करोड़ रुपये रिश्वत लेने का आरोप लगाया गया, जिसका आरोप वह वर्मा पर लगा रहे थे।

सना रिश्वतखोरी के एक अलग मामले में जांच का सामना कर रहा है, जिसमें मांस कारोबारी मोइन कुरैशी की कथित संलिप्तता है। सीबीआई के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि इसके दो सबसे बड़े अधिकारी कलह में उलझे हैं। जांच एजेंसी में चल रहे आंतरिक कलह के कारण उस पर उठ रहे सवालों को देखते हुए सीबीआई की साख बरकरार रखने के लिए सरकार ने 23 अक्टूबर की आधी रात को अभूतपूर्व कदम उठाते हुए वर्मा और अस्थाना दोनों को छुट्टी पर भेज दिया था।

 

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