“हिन्दुओं ने शाकाहार को ये सोचकर अपनाया था कि अहिंसा के पथ पर चलेंगे। आज वही हिन्दू, जानवर का मांस खाने वालों को मारने के लिए जानवर हो गया है”

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इक्कीसवीं सदी है। स्मार्टफ़ोन हम से बातें करने लगे हैं, जानकारी रौशनी की गति से दौड़ने लगी है, रात होती ही नहीं और बादलों को हम बीज की तरह सींचने लगे हैं। एसे में हम भारतवासी इस उधेड़बुन में मसरुफ हैं कि किस तरह के माँस खाने वाले को मौत के घाट उतारा जाए और किस बाबा के गेरुए चोग़े में अपने मोक्ष की चाबी ढूँढी जाए।

देश-विदेश में जहाँ एक ओर तकनीकी प्रगति इंसान के जीवन के मौलिक स्तर को नापने की कसौटी बन गई है, वहीं दूसरी ओर शायद हम आज भी अपनी सामूहिक पहचान तलाश रहे हैं। इसे कुछ लोग राष्ट्रीय समरूपताया नेशनल आईडेंटटी कहेंगे। भारत की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई ये है कि किसी बूढ़े फ़कीर की हथेली की तरह यहाँ इतनी सारी अतिव्यापी और प्रतिच्छेद लकीरें हैं कि हम एक होने का ढोंग भर ही कर पा रहे हैं।

ये लकीरें ऐसे विभाजन तो करती ही हैं जो व्यापक हैं जैसे रुप, रंग, धर्म, जाति, लिंग और आर्थिक दशा। लेकिन अब ऐसे विभाजन भी होने लगें हैं जो हफ़्तों से इस फ़क़ीर के हाथ न धुलने से बन गए हैं, लिहाज़ा सिर्फ़ गंदगी से पनपते हैं जैसे कौन क्या खाता है, किसने कितने ज़ोर से ऊपरवाले को याद किया, किसने अपनी औरत को ज़्यादा पीटा और किसका पाजामा कितना लम्बा है।

दिमागी गंदगी से उपजने वाले इन विभाजनों पे बड़े बड़े ज्ञानी अपने विचार प्रकट करते रहे हैं। बातों में एक और बात जोड़ने की नीयत-भर से यदि शाकाहार की जड़ें टटोली जाए तो हिन्दू धर्म की उदारता के कई सबूत सामने आयेंगे।शाकाहार के गुणों की गिनाती की कई लम्बी सूचियाँ हमें हर भाषा में मिल जाएँगीं। मज़े की बात है कि भारतीय हिन्दुओं को ग़ैर-हिन्दू वर्ग का शाकाहारी होना बहुत भाता है।

उनके लिए ये गर्व का मंज़र है कि हमारे शास्त्रों के ज्ञान का लोहा हर तरफ़ माना जा रहा है। लेकिन यही हिन्दुस्तानी हिन्दु स्वयं कभी अपने शास्त्रों को पढ़ने का कष्ट नहीं करते। जो पैदा ही हिन्दू होेंगे उसे हिन्दू धर्म को जानने की क्या ज़रुरत? राम-सीता की कहानी का मोटा-मोटी सार पता हो, महाभारत की जड़ द्रौपदी की हँसी है ये पता हो, हनुमान चालीसा और गायत्री मंत्र आता हो तो मजाल है कोई हमसे ज़्यादा हिन्दू हो जाए?

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लेकिन क्या कोई पूरी संस्कृति ख़ुद में समेटने वाला धर्म इतना निर्धन और संकुचित हो सकता है? जो धर्म नियमन देकर, जीवन यापन का मार्ग दिखाना चाहे, क्या वो इतना एकतरफ़ा और समतल हो सकता है? नहीं। दरअसल, वेदों, उपनिषदों और पुराणों में हिन्दू धर्म के एक अताह सागर होने का अहसास होता है। समय और राजाओं के बदलने से हिन्दू धर्म भी बदलता रहा।

कैसे वेदों में मंदिर और मूर्ति बनाना ग़लत माना जाता था, कैसे बौध धर्म के आने के साथ ही हिन्दू धर्म भी बदल गया और कैसे माँसाहार को त्यागकर हिन्दू लोग शाकाहार की ओर आकर्षित होने लगे। वेदों में और ख़ास करके आयुर्वेद में खान-पान और पोषण के संदर्भ में कई बातें बताई गई हैं। लेकिन हमारी कमी है कि हम इन बातों को तब तक सच नहीं मानते जब तक कोई गेरुआ चोगा पहने ये बातें न कह दे। और दुख की बात ये है कि कोई गेरुआ पहने कभी माँसाहार के पक्ष में नहीं बोलता। हाँ, कभी कभी नूडल्स के पक्ष में ज़रूर बोल देता है!

तब भी, आयुर्वेद में विभिन्न बीमारीयों के उपचार के लिए अलग-अलग क़िस्म की खुराक का विवरण है। इनमें काफ़ी विस्तार से माँस के सेवन के महत्व के बारे में कहा गया है। हाँ, सच ये भी है कि और वेदों में माँस के सेवन के ख़िलाफ़ भी कई तर्क मिलेंगे। लेकिन अगर आप बिना पढ़े, उन शाकाहारी तर्कों को अपनाने को तैयार हैं तो क्या इसी तरह आप माँसाहार के पक्ष में दिए गए तर्कों को भी मान लेंगे?

लॉजिक के हिसाब से तो आपको मान लेना चाहिए पर अफ़सोस, धर्म लॉजिक से कोसों दूर है। फिर भी, वेदों के माँसाहार पर नज़र डालते हैं। महाभारत के तीसरे, बारहवें, तेरहवें और चौदहवें अध्याय में माँसाहार के पक्ष और विपक्ष दोनों ही के तर्क मिलेंगे। ग़ौरतलब है कि पक्ष और विपक्ष दोनों ही पूर्णत: हिन्दू हैं और उनका विवाद परस्पर सम्मान के दायरे में है। इक्कीसवीं सदी है और यहाँ विचारों के मतभेद का परिणाम सिर्फ़ खून-खच्चर ही होता है।

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ख़ैर, महाभारत में अगस्त ऋषि की प्रसिद्ध कहानी में वतापी के माँस को भिक्षुक और ब्राह्मण साधारणत: खाते थे। बैल का माँस समझकर वो जिस राक्षस को खा जाते थे, उससे निजात पाने के लिए अगस्त्यमुनि ने क्या तरक़ीब लगाई, ये ज़रूरी नहीं। महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि ब्राह्मण भी माँस खाते थे। परम्परायें अगर इच्छाओं से जन्म लेती हैं तो यहाँ माँस खाने की हिन्दू परम्परा को माँस खाने की इच्छा से भी जोड़ा जा सकता है।

रामायण के मायावी सुनहरे मृग की छाल को देखकर सीता क्यों इतनी आकर्षित हो उठी थीं? उसकी छाल उतारने से पहले उसके माँस का सेवन करना स्वाभाविक था। जंगल में रहने वाली इस दम्पत्ति का माँस खाना कोई बड़ी बात नहीं है। इस तरह के खान-पान को हर दृष्टि से वाजिब मानना चाहिए लेकिन आज के बहके हुए हिन्दुओं को समझाना मृग को पकड़ने से भी मुश्किल है।

आयुर्वेद में तीन तरह की खुराक का ज़िक्र किया गया है: तामसिक, राजसिक और सात्विक। बरसों से इन शब्दों का दुरुपयोग करके हिन्दुओं को माँसाहार के ख़िलाफ़ उकसाया गया है। लेकिन खुराक और जीवन शैली के इस विवरण से किसी व्यक्ति की योग्यताओं का आँकलन लगाना नहीं सिखाया गया! ऐसा कही नहीं लिखा है कि राजसिक भोजन खाने वाला सात्त्विक भोजन के सेवन करने वाले से कमतर है।

शारीरिक गठन के अनुसार खाद्य पदार्थ की खुराक और सामग्री बदलना ही इस विभाजन का आधार है। हर व्यक्ति को अपने शरीर और उसकी उर्जा की आवश्यकता अनुसार खुराक लेनी चाहिए। माँसाहारी व्यंजनों के फ़ायदों के बारे में चरक संहिता भी विस्तार में बताती है। ममसारास या एक क़िस्म के माँस के सूप से स्वास्थ्य लाभ के बारे में आयुर्वेद में बार-बार ज़िक्र किया गया है।

तो हिन्दुओं का सदा से शाकाहारी होने का दावा क्या एक ढोंग नहीं? या अपने ही धार्मिक ग्रंथों से अनजान रहकर भेड़चाल में चलना ही सच्चा हिन्दू होने का प्रमाण है? हमारे यहाँ भी, पश्चिम की ही तरह, धार्मिक ग्रंथों को आम आदमी तक पहुँचने नहीं दिया गया। लोगों को भगवान तक पहुँचाने वाला ब्राह्मण अपने तरह की राजनीति करता रहा। इतिहास गवाह है मीराबाई हो या सुदामा, सच्चे भक्तों को अपने भक्ति गीत ख़ुद ही रचने पड़े हैं।

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किसी ग्रंथ में लिखा गया ईश्वर का कोई भी महिमा गान उन तक नहीं पहुँचा था। जो समाज के हाथ में दिया गया वो धर्म के नाम पर आधे-अधूरे किससे कहानियाँ थे। वेदों, पुराणों से तो हमें इतना वंचित रखा गया है कि एक आम व्यक्ति ये भी नहीं बता पाएगा कि ये ग्रंथ कितने भारी या हलके है। यहाँ तक कि महाभारत को पढ़ना भी अशुभ क़रार दे दिया गया! कहा जाता है कि जिस घर में महाभारत होगी, वहाँ भाई-भाई से लड़ेगा।

इक्कीसवीं सदी है। महाभारत कही नहीं है लेकिन भाई तो भाई के ख़ून का प्यासा ही है। एक ने उपवास रखकर भी दूसरे को इस बात की सज़ा दी है कि उसने माँस खाया है। गौमाँस। हिन्दुओं ने शाकाहार को ये सोचकर अपनाया था कि अहिंसा के पथ पर चलेंगे। आज वही हिन्दू, जानवर का मांस खाने वालों को मारने के लिए जानवर हो गया हैं। वैसे जानवर कहना ठीक नहीं होगा। जानवर तो भूख मिटाने के लिए शिकार करते हैं। ये हिन्दू तो अहिंसा की प्यास मिटाने चले थे।

ये विचार शाकाहार के विरुद्ध न होकर, बेमतलब भेदभाव के ख़िलाफ़ है। जिस देश में अनेकों धर्मों को मानने वाले लोग रहते हों, और जहाँ का सबसे बड़ा धर्म समूह अपने भीतर अनेकों अनेक असमानताएँ सँजोए है, वहाँ खुराक के नाम पर दुश्मनी और ‘बुलीइज़म’ सरासर ग़लत है। सदी कोई भी हो, विभिन्नताओं को ख़त्म करने की कोशिशें शर्मनाक होती हैं और देश के “विकास” में बाधक भी।

(लेखिका दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तित्व विचार हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य या व्यक्त किए गए विचार ‘जनता का रिपोर्टर’ के नहीं हैं)

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