अयोध्या भूमि विवाद मामले पर सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ का पुनर्गठन, CJI रंजन गोगोई ने दो नए जज किए शामिल

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सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक रूप से संवदेनशील अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले पर सुनवाई के लिये शुक्रवार (25 जनवरी) को पांच सदस्यीय एक नई संविधान पीठ का गठन किया। बेंच में दो नए जजों को शामिल किया गया है। नई पीठ में न्यायमूर्ति भूषण और न्यायमूर्ति नजीर नए सदस्य हैं।

(Reuters Photo)

पीठ का पुनर्गठन इसलिए किया गया, क्योंकि मूल पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति यू यू ललित ने 10 जनवरी को मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। उन्होंने मामले की सुनवाई में आगे हिस्सा लेने से मना कर दिया था, क्योंकि वह 1997 में एक संबंधित मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की तरफ से एक वकील के तौर पर पेश हुए थे।

नई पीठ में प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर को शामिल किया गया है। न्यायमूर्ति एन वी रमण भी नई पीठ का हिस्सा नहीं हैं। वह 10 जनवरी को जिस पीठ ने मामले पर सुनवाई की थी, उसमें शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने विभिन्न पक्षों को भेजे गए नोटिस में कहा कि अयोध्या विवाद मामला गुरुवार 29 जनवरी 2019 को ‘‘प्रधान न्यायाधीश की अदालत में संविधान पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा। पीठ में सीजेआई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर होंगे।’’

न्यायमूर्ति भूषण और न्यायमूर्ति नजीर तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा (अब सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ का हिस्सा थे, जिसने 27 सितंबर 2018 को 2:1 के बहुमत से शीर्ष अदालत के 1994 के एक फैसले में की गई एक टिप्पणी को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास पुनर्विचार के लिये भेजने से मना कर दिया था। शीर्ष अदालत ने 1994 के अपने फैसले में कहा था कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। यह मामला अयोध्या भूमि विवाद मामले पर सुनवाई के दौरान उठा था।

न्यायमूर्ति नजीर ने बहुमत के फैसले से अलग राय जताई थी। बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में 14 अपील दायर हैं। चार दीवानी मुकदमों पर सुनाए गए अपने फैसले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2.77 एकड़ जमीन को तीन पक्षों–सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था।

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