अहम मुद्दों पर सुनवाई के लिए CJI दीपक मिश्रा ने बनाई पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ, प्रेस कॉन्फेंस करने वाले चारों जजों का नाम नहीं

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सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों की ओर से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा के खिलाफ मोर्चा खोले जाने के बाद अब मामला सुलझ गया है। बार काउन्सिल ऑफ इंडिया ने सोमवार (15 जनवरी) कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने से उत्पन्न संकट आंतरिक तरीके से हल कर लिया गया है और अब कहानी खत्म हो गई है।

PHOTO: PTI

इस बीच न्यूज एजेंसी भाषा के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई को लेकर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और चार सबसे वरिष्ठ जजों के बीच एक तरह से मतभेद उभरने के बीच शीर्ष अदालत ने सीजेआई की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ के गठन की घोषणा की जिसमें ये चारों जज शामिल नहीं हैं।

भाषा के मुताबिक शीर्ष अदालत ने सोमवार (15 जनवरी) को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के गठन की घोषणा की। खास बात यह है कि इस पीठ में वे चारों न्यायाधीश शामिल नहीं हैं, जिन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठाए थे।

चारों न्यायाधीशों- न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एम.बी. लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ में से किसी का नाम पांच जजों की संविधान पीठ के सदस्यों में नहीं है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक पांच न्यायाधीशों की पीठ में सीजेआई दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी, न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर, न्यायमूर्ति डी.वाई.चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं।

यह संविधान पीठ 17 जनवरी से कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई शुरू करेगी। इस बीच अदालत के सूत्रों ने कहा कि इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि चीफ जस्टिस ने सोमवार को उन चारों न्यायाधीशों से मुलाकात की या नहीं जिन्होंने 12 जनवरी को संवाददाता सम्मेलन में सीजेआई के खिलाफ आरोप लगाए थे।

कार्यसूची के अनुसार पांच न्यायाधीशों की पीठ आधार कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले मामले और सहमति से वयस्क समलैंगिकों के बीच यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के फैसले को चुनौती देने से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में सुनवाई करेगी। इन्हीं न्यायाधीशों ने पिछले साल 10 अक्टूबर से संविधान पीठ के विभिन्न मामलों में सुनवाई की थी। इनमें प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच टकराव का मामला भी है।

यह पीठ केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओें के प्रवेश पर रोक के विवादास्पद मुद्दे पर भी सुनवाई करेगी और इस कानूनी सवाल पर सुनवाई फिर शुरू करेगी कि क्या कोई पारसी महिला दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी के बाद अपनी धार्मिक पहचान खो देगी। संविधान पीठ अन्य जिन मामलों को देखेगी उनमें आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे किसी जनप्रतिनिधि के अयोग्य होने से संबंधित सवाल पर याचिकाएं भी हैं।

इन सभी मामलों को पहले शीर्ष अदालत की बड़ी पीठों को भेजा गया था। मंगलवार की दैनिक कार्यसूची के मुताबिक न्यायमूर्ति लोया की मौत के मामले में जांच की दो जनहित याचिकाएं न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली एक पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है, जिनके खिलाफ एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने सार्वजनिक रूप से आक्षेप लगाए थे।

Rifat Jawaid on the revolt by Supreme Court judges

Posted by Janta Ka Reporter on Friday, 12 January 2018

CJI के खिलाफ जजों ने खोला मोर्चा

बता दें कि 12 जनवरी को आजाद भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने मीडिया के सामने आकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठाए। अभूतपूर्व घटना में जजों ने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्र के खिलाफ सार्वजनिक मोर्चा खोल दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद चारों जजों ने एक चिट्ठी जारी की, जिसमें सीजेआई की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

सीजेआई के बाद वरिष्ठता में दूसरे से पांचवें क्रम के जजों जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एमबी लोकुर व जस्टिस कुरियन जोसेफ ने आरोप लगाया कि ‘सुप्रीम कोर्ट प्रशासन में सब कुछ ठीक नहीं है। कई चीजें हो रही है जो नहीं होनी चाहिए। यह संस्थान सुरक्षित नहीं रहा तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।’ जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि हमने हाल में सीजेआई को पत्र लिखकर अपनी बात रखी थी।

12 जनवरी को भी शिकायत की, लेकिन वह नहीं माने। इसीलिए लोकतंत्र की रक्षा के लिए मीडिया के सामने आना पड़ा। उन्होंने मीडिया को सात पेज की वह चिट्ठी भी बांटी जो सीजेआई को लिखी थी। उसमें पीठ को केस आवंटन के तरीके पर आपत्ति जताई गई है। जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया के एक मुद्दे का तो उल्लेख है, लेकिन माना जा रहा है कि यह खींचतान लंबे अर्से से चल रही थी।

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