मोदी-केजरीवाल के बीच फिर छिड़ सकती है ‘जंग’, केंद्र सरकार ने विधायकों की सैलरी बढ़ाने वाला प्रस्ताव लौटाया

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नई दिल्ली। दिल्ली की केजरीवाल सरकार और केंद्र की मोदी सरकार के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ने के आसार नजर आने लगे हैं। इस बार इस जंग की वजह दिल्ली के विधायकों की सैलरी हो सकती है। दरअसल, गृह मंत्रालय ने दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल के जरिए दिल्ली सरकार के विधायकों की सैलरी बढ़ाने वाले बिल को वापस लौटा दिया है। बात दें कि केजरीवाल सरकार ने विधायकों की सैलरी में करीब 400 फीसदी का इजाफा करने का प्रस्ताव पास किए थे।

वहीं, इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि देश में दो तरह की राजनीति के फार्मूले हैं। पहला, ईमानदारी से सेवा करो जो हमारे विधायक कर रहे हैं, जबकि दूसरे वे हैं जो अभी तक होता आया है।

सिसोदिया ने कहा कि हम इसलिए सैलरी बड़ा रहे हैं, क्योंकि उनको अबतक 12 हजार रुपये ही मिलते हैं, जो नाकाफी है। अगर कांग्रेस और बीजेपी के पास कोई फॉर्मूला है तो वो हमें बता दें। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस बिल को उप राज्यपाल ने यह कहते हुए लौटा दिया है कि दिल्ली सरकार वैधानिक प्रक्रिया के तहत इस बिल को दोबारा सही फॉर्मेट में भेजे।

केंद्र सरकार के सूत्रों की मानें तो गृह मंत्रालय ने कहा है कि दिल्ली सरकार वे कारण बताए जिससे यह माना जा सके कि दिल्ली में विधायकों की जीवनयापन का खर्च 400 प्रतिशत तक बढ़ा है। खबरों के मुताबिक, गृह मंत्रालय ने इस बिल को मात्र एक लाइन की सलाह के साथ वापस कर दिया है।

मंत्रालय ने लिखा है कि यह बिल सही फॉर्मेट के साथ नहीं भेजा गया है और इसे तभी आगे बढ़ाया जा सकता है, जब यह सही तरीके के साथ भेजा जाए। गौरतलब है कि 2015 में दिल्ली विधानसभा ने विधायकों की सैलरी में संशोधन संबंधी यह विधेयक पास किया था। जिसके तहत इसमें विधायकों की सैलरी 88 हजार से बढ़ाकर 2 लाख 10 हजार रुपये करने का प्रस्ताव रखा था।

इसके साथ विधायकों का यात्रा भत्ता भी 50,000 रुपये से बढ़ाकर तीन लाख सालाना करने का प्रावधान किया। इस बिल के अनुसार, दिल्ली के विधायकों को बेसिक सैलरी- 50,000, परिवहन भत्ता- 30,000, कम्यूनिकेशन भत्ता- 10,000 और सचिवालय भत्ते के रूप में 70,000 रुपये प्रति महीने का प्रावधान था।

बता दें कि केंद्र ने गत वर्ष अगस्त में केजरीवाल सरकार से इस प्रस्ताव के संदर्भ में कई सवाल पूछे थे। केंद्र ने दिल्ली सरकार से इतनी अधिक बढ़ोतरी का व्यवहारिक पक्ष जानना चाहा था।

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