क्या मोदी सरकार द्वारा मनरेगा के तहत अनुमानित मांग कम करने के लिए राज्यों पर बनाया जा रहा है दबाव?

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सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार(13 फरवरी) को एक गैर सरकारी संगठन ने आरोप लगाया कि केन्द्र ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत कार्यक्रमों के लिए धन की अनुमानित मांग कम करने के लिए राज्यों पर दबाव डाल रहा है जिसकी वजह से राज्य नागरिकों को रोजगार उपलब्ध कराने मे असमर्थ हैं।

मोदी

न्यूज़ एजेंसी भाषा की ख़बर के मुताबिक, न्यायमूर्ति मदन बी. लोकूर और न्यायमूर्ति एन वी रमण की पीठ को गैर सरकारी संगठन स्वराज अभियान के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि केन्द्र महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत धन की अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं कर सकता है। इस कानून के तहत प्रत्येक परिवार को साल में सौ दिन का रोजगार देने का प्रावधान है।

भूषण ने कहा, ‘आज आधे से अधिक राज्यों की सरकारों पर केन्द्र में काबिज पार्टी का नियंत्रण है। इसी वजह से केन्द्र ने राज्यों से कह रहा है कि कोष के बारे में अधिक आनाकानी नहीं करें। केन्द्र कह रहा है कि अगर आप इसके बारे में आनाकानी करेंगे तो हम बजट में कटौती कर देंगे।’

उन्होंने कहा कि यदि साल में प्रति परिवार सौ दिन के रोजगार की सीमा पार करती है और सरकार सरकार धन को सीमित नहीं करती है तो बजटीय बाध्यता आ सकती है। उन्होंने कहा, ‘केन्द्र राज्यों को अनुमानित मांग कम करने के लिए बाध्य कर रही है।’ उन्होंने इस कानून के तहत औसतन रोजगार प्रति वर्ष सौ दिन से घटकर 40-45 दिन हो गया है।

भूषण ने इस मामले में अपनी दलीलें पूरी कर लीं। अब अटार्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल पांच मार्च को अपनी दलीलें पेश करेंगे। केन्द्र ने इससे पहले न्यायालय से कहा था कि ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जिसमे उसने इस कानून के तहत रोजगार के अधिकतम दिनों को सीमित किया हो या राज्यों को धन उपलब्ध नहीं कराया हो।

केन्द्र ने कहा था कि 2016-17 के वित्तीय वर्ष में 20 राज्यों ने बजट की उस सीमा को पार किया था जिसके लिए सहमति बनीं थी और केन्द्र ने उन्हें धन उपलब्ध कराया था।

इस मामले में सुनवाई के दौरान भूषण ने पीठ से कहा कि अनेक राज्यों ने इस कानून के तहत अधिक धन मुहैया कराने के लिए केन्द्र को लिखा है क्योंकि मंजूर किया गया बजट खत्म होने के बाद राज्य लोगों को रोजगार नहीं प्रदान कर सकते। उन्होंने कहा कि 2017-18 में कुल 48,500 करोड़ रूपए की राशि आबंटित की गई थी।

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