CBI में घूस पर घमासान: राकेश अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच कर रही टीम बदली गई, DSP एके बस्सी का तबादला कर पोर्ट ब्लेयर भेजा गया

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इस समय देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) खुद सवालों के घेरे में आ गई है। सीबीआई के दो सीनियर अधिकारी एक दूसरे के ऊपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। सीबीआई में आतंरिक कलह के मद्देनजर मोदी सरकार ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया है। वहीं संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को तत्काल प्रभाव से अंतरिम निदेशक नियुक्त कर दिया है। ओडिशा कैडर के 1986 बैच के आईपीएस अधिकारी राव ने मंगलवार रात ही पदभार संभाल लिया।

(Photo Source: Rakesh Asthana / Facebook)

नागेश्वर राव के पदभार संभालते ही बुधवार को एजेंसी के कुछ अधिकारियों के तबादले तथा कुछ को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिए। इनमें वह अधिकारी भी शामिल हैं जो अस्थाना पर लगे रिश्वत के आरोपों की जांच कर रहे थे। इस बीच सरकार ने केंद्रीय सतर्कता आयोग की निगरानी में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) से पूरे मामले की जांच कराने का फैसला लिया है। वित्त मंत्री अरूण जेटली ने बुधवार को देश में जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता को बरकरार रखने के लिए दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेजा गया और दोनों पर लगे आरोपों की जांच कराने का फैसला लिया गया है।

राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच कर रही टीम बदली गई

समाचार एजेंसी भाषा की रिपोर्ट के मुताबिक बीती रात प्रभारी निदेशक नियुक्त किए जाने के बाद एम नागेश्वर राव ने राकेश अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही टीम में बड़े बदलाव कर डाले। उन्होंने इस जांच टीम में बिल्कुल नए चेहरों को शामिल किया है। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जांच अधिकारी से लेकर पर्यवेक्षण स्तर तक के अधिकारी बदल दिए गए हैं।

अधिकारियों ने बताया कि 1986 बैच के ओड़िशा कैडर के आईपीएस अधिकारी एम. नागेश्वर राव ने पुलिस अधीक्षक के तौर पर सतीश डागर को अस्थाना के खिलाफ दर्ज मामले की जांच का जिम्मा सौंपा है। पिछले जांच अधिकारी डीएसपी ए. के. बस्सी का ‘‘जनहित’’ में तबादला कर ‘‘तत्काल प्रभाव’’ से पोर्ट ब्लेयर भेज दिया गया। सीबीआई की ओर से जारी आदेश में यह जानकारी दी गई। डागर इससे पहले डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के खिलाफ मामलों की जांच कर चुके हैं।

पुलिस अधीक्षक डागर की ओर से की जाने वाली जांच के पहले पर्यवेक्षण अधिकारी होंगे डीआईजी तरुण गाबा, जिन्होंने व्यापमं घोटाले के मामलों की जांच की थी। संयुक्त निदेशक स्तर पर वी. मुरुगेशन को लाया गया है। वह सीबीआई मुख्यालय में भ्रष्टाचार निरोधक इकाई-एक के संयुक्त निदेशक होंगे। अधिकारियों ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने कोयला घोटाले की जांच में मुरुगेशन पर भरोसा जताया था।

एक अन्य आदेश में सीबीआई ने संयुक्त निदेशक (नीति) अरुण कुमार शर्मा का तबादला कर उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड की जांच कर रही मल्टी-डिसिप्लीनरी मॉनिटरिंग एजेंसी (एमडीएमए) के संयुक्त निदेशक पद पर तैनात किया है। वरिष्ठ अधिकारी ए. साई मनोहर का तबादला कर उन्हें चंडीगढ़ जोन का संयुक्त निदेशक बनाया गया है जबकि डीआईजी आर्थिक अपराध-तीन के पद पर कार्यरत अमित कुमार संयुक्त निदेशक (नीति) का अतिरिक्त प्रभार संभालेंगे।

राकेश अस्थाना पर भ्रष्टाचार का आरोप

आपको बता दें कि आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच पिछले कुछ दिनाें से आरोप-प्रत्यारोंपों का सिलसिला चल रहा था। इस विवाद में उस समय नया मोड आया जब 15 अक्टूबर को अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक अस्थाना, उप अधीक्षक देवेंद्र कुमार तथा कुछ अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली। अस्थाना पर मांस कारोबारी मोइन कुरैशी के मामले के सिलसिले में कथित तौर पर तीन करोड़ रुपये रिश्वत लेने का आरोप है। कथित रिश्वत देने वाले सतीश सना के बयान पर यह केस दर्ज किया गया था।

सना रिश्वतखोरी के एक अलग मामले में जांच का सामना कर रहा है, जिसमें मांस कारोबारी मोइन कुरैशी की कथित संलिप्तता है। करीब दो महीने पहले अस्थाना ने निदेशक वर्मा के खिलाफ की गई शिकायत में आरोप लगाया था कि सना ने राहत पाने के लिए वर्मा को रिश्वत के तौर पर दो करोड़ रुपए दिए। सीबीआई ने अस्थाना की टीम में डीएसपी रहे देवेंद्र कुमार को भी गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसी ने मंगलवार को दिल्ली की एक अदालत को बताया था कि हाई-प्रोफाइल मामलों की आड़ में सीबीआई में एक ‘‘वसूली रैकेट’’ चलाया जा रहा था।

सीबीआई के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि इसके दो सबसे बड़े अधिकारी कलह में उलझे हैं। अस्थाना ने प्राथमिकी दर्ज किए जाने के खिलाफ गत मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहां से उन्हें 29 अक्टूबर को अगली सुनवाई तक किसी तरह की कार्रवाई से राहत मिल गई। जांच एजेंसी में चल रहे आंतरिक कलह के कारण उस पर उठ रहे सवालों को देखते हुए उसकी साख बरकरार रखने के लिए सरकार ने मंगलवार रात अभूतपूर्व कदम उठाते हुए वर्मा और अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया।

…जब आमने-सामने आए दोनों आलाधिकारी

दोनों आला अधिकारियों की कलह उस वक्त सामने आई जब आलोक वर्मा ने केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के समक्ष तत्कालीन अतिरिक्त निदेशक राकेश अस्थाना की विशेष निदेशक पद पर तरक्की का विरोध किया। वर्मा के विरोध को दर्ज तो किया गया, लेकिन सीवीसी ने एकमत से विशेष निदेशक पद के लिए अस्थाना के नाम को मंजूरी दे दी, जिससे वह जांच एजेंसी में दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी बन गए। एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर राकेश अस्थाना को विशेष निदेशक बनाए जाने को चुनौती दी थी।

अस्थाना ने आलोक वर्मा पर लगाया भ्रष्टाचार का आरोप

शराब कारोबारी विजय माल्या, अगस्ता वेस्टलैंड और हरियाणा में जमीन अधिग्रहण से जुड़े मामले सहित कई संवेदनशील केस की जांच कर रही एसआईटी के प्रभारी रहे अस्थाना ने 24 अगस्त को वर्मा के खिलाफ एक सनसनीखेज शिकायत कर आरोप लगाया कि उन्होंने एक मामले के आरोपी से दो करोड़ रुपए की कथित रिश्वत ली। अस्थाना ने वर्मा के खिलाफ 10 और मामलों में भ्रष्टाचार एवं अनियमितता के आरोप लगाए थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि वर्मा ने राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के परिसरों पर छापेमारी रोकने की कोशिश की थी।

सरकार ने शिकायत सीवीसी को भेजा

सरकार ने यह मामला सीवीसी के हवाले कर दिया था जिसने अस्थाना की शिकायत में दर्ज मामलों की फाइलें तलब की। अपने जवाब में वर्मा ने आयोग को बताया कि कम से कम छह मामलों में अस्थाना की भूमिका जांच के दायरे में है। इसमें एक मामला गुजरात स्थित स्टर्लिंग बायोटेक की ओर से कर्ज न चुकाने से संबंधित है। उन्होंने सीवीसी को यह भी बताया कि उनकी गैर-मौजूदगी में दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी अस्थाना सतर्कता आयोग की बैठकों में उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते।

अस्थाना ने सरकार से दखल देने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा था कि वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र जांच कराई जाए। वर्मा और अस्थाना से जुड़े मामलों की सूचनाओं का जब आधिकारिक स्तर पर आदान-प्रदान हो रहा था, उसी वक्त उन सूचनाओं को मीडिया में भी लीक किया जा रहा था जिससे दोनों अधिकारियों के बीच की कलह खुलकर सामने आ गई।

सीबीआई के पूर्व अधिकारियों ने नाम का खुलासा नहीं करने की शर्त पर समाचार एजेंसी भाषा को बताया कि यह स्थिति ‘‘दुर्भाग्यपूर्ण’’ है और इससे विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के प्रत्यर्पण से जुड़े मामलों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसी के आला अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों के मद्देनजर अब आरोपी दलील दे सकते हैं कि उनके खिलाफ लगे आरोप प्रेरित हैं।

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