BJP के सहयोगी हनुमान बेनीवाल ने प्रदर्शनकारी किसानों के समर्थन में संसद की तीन समितियों से दिया इस्तीफा

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कृषि कानूनों के विरोध में एनडीए (NDA) के सहयोगी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के अध्यक्ष और सांसद हनुमान बेनीवाल ने शनिवार को ससंद की तीन समितियों की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने किसान आंदोलन के समर्थन में यह इस्तीफा दिया है। हनुमान बेनीवाल ने अपना इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजा है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजे अपने इस्तीफे में बेनीवाल ने कहा कि तीनों कानून किसानों विरोधी है। उन्होंने खुद पर बाड़मेर में हुए हमले की अब तक जांच नहीं होने की बात भी बिरला को भेजे इस्तीफे में कही है।

हनुमान बेनीवाल

बेनीवाल ने जयपुर में मीडिया से बात करते हुए कहा कि 26 दिसंबर को वह दो लाख किसानों के साथ दिल्ली की ओर कूच करेंगे और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में बने रहने के बारे में भी फैसला उसी दिन होगा। बिरला को भेजे पत्र में बेनीवाल ने संसद की उद्योग संबंधी स्थायी समिति, याचिका समिति व पेट्रोलियम व गैस मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति से इस्तीफा देने बात की है।

बेनीवाल के अनुसार, उन्होंने सदस्य के रूप में जनहित से जुड़े अनेक मामलों को उठाया, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए वह किसान आंदोलन के समर्थन में और लोकहित के मुद्दों को लेकर संसद की तीन समितियों के सदस्य पद से त्याग पत्र दे रहे हैं। बेनीवाल ने आरएलपी की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक के बाद यह घोषणा की।

बता दें कि, नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। वो लगातार किसानों के लिए आवाज उठा रहे हैं। हनुमान बेनीवाल ने इससे पहले कहा था कि किसानों के लिए बने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू होनी चाहिए। सांसद बेनीवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसानों के हित में फैसला लेना चाहिए नहीं तो उनके लिए भी मुश्किल खड़ी हो सकती है।

गौरतलब है कि, मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों के विरोध में प्रदर्शन कर रहे किसानों के आंदोलन को लगभग हर तरफ से समर्थन मिल रहा है। विरोध कर रहे किसानों के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार विपक्ष के साथ-साथ अपनी सहयोगी पार्टियों के भी निशाने पर आ गई है। कृषि कानूनों के विरोध में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के अंदरूनी इलाकों से आए हजारों किसान देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर 26 नवंबर से डटे हुए हैं। किसानों की मांग है कि, सरकार इन कृषि कानूनों को वापस लें।

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