एससी-एसटी संशोधन विधेयक लोकसभा से पारित, कांग्रेस बोली- विधेयक लाने में मोदी सरकार को 3-4 महीने लग गए

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केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के लिए सोमवार (6 अगस्त) का दिन काफी राहत भरा था। दरअसल अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) एक्ट को लेकर राजनीतिक शह-मात के बीच सोमवार को एससी-एसटी (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2018 लोकसभा में ध्वनिमत से पारित हो गया। वहीं राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को भी सोमवार को ही संसद की मंजूरी मिल गई।

संसद
(HT File Photo)

एससी/एसटी कानून संशोधन विधेयक पारित

लोकसभा में सोमवार को अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक, 2018 पारित हो गया। इस संशोधन के जरिए सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश निष्प्रभावी हो जाएगा, जिसके तहत एससी/एसटी अत्याचार निवारण के मामले में आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई थी। यह संशोधन विधेयक लोकसभा में केंद्रीय न्याय एवं आधिकारिता मंत्री थावर चंद गहलोत ने पिछले सप्ताह पेश किया था।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर शीर्ष अदालत के आदेश को निरस्त कर एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के मूल प्रावधानों को बरकरार रखने की गुहार लगाई थी। समाचार एजेंसी IANS के मुताबिक गहलोत ने लोकसभा में इस विधेयक पर चर्चा के दौरान कहा, ‘सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ वहां समीक्षा याचिका दाखिल की थी। उस आदेश में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) विधेयक, 1989 के वास्तविक प्रावधानों को कमजोर बनाया गया था।’

बता दें कि अदालत के आदेश में कहा गया था कि आरोपी की गिरफ्तारी के लिए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) की मंजूरी जरूरी होगी लेकिन यह संभव नहीं है, क्योंकि भारत के अधिकतर जगहों पर एसएसपी नहीं हैं। उन्होंने बताया कि उनके गृह प्रदेश मध्यप्रदेश में, एसएसपी केवल ग्वालियर, भोपाल और इंदौर में ही पदस्थ हैं। उन्होंने सदस्यों से भी विधेयक का समर्थन करने का आग्रह किया।

विधेयक पर बहस का जवाब देते हुए गहलोत ने कांग्रेस से कहा कि अगर उनको एससी/एसटी के अधिकारों की रक्षा की चिंता थी तो उन्होंने 1989 में कानून के पारित होने के बाद उसे मजबूत क्यों नहीं बनाया? मंत्री ने कहा कि अधिनियम के तहत अब 47 अपराधों को शामिल किया गया है, जबकि पहले इसमें सिर्फ 22 अपराधों को शामिल किया गया था। गहलोत ने कहा, ‘हमने विधेयक को लाने में देर नहीं की। विपक्ष ने देश में अफवाह फैलाने की कोशिश की कि हम एससी/एसटी विरोधी हैं और विधेयक में विलंब कर रहे हैं।’

कांग्रेस ने लगाया देरी का आरोप

लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सदन में विधेयक लाने में नरेंद्र मोदी सरकार को 3-4 महीने लग गए। सरकार इतने दिनों तक इस संबंध में अध्यादेश क्यों नहीं लाई? उन्होंने कहा, ‘अगर सरकार कॉर्पोरेट के पक्ष में विभिन्न मुद्दों पर छह अध्यादेश ला सकती है, तो सरकार को इस मामले में भी सातवां अध्यादेश लाना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्य से सरकार देश की 25 प्रतिशत आबादी के अधिकारों के लिए अध्यादेश नहीं ला सकी। अब चौतरफा दबाव के बाद विधेयक लाया गया।’

ओबीसी आयोग को मिला संवैधानिक दर्जा

एससी-एसटी के अलावा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा देने से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को संसद की मंजूरी मिल गई। राज्यसभा ने सोमवार को इससे संबंधित ‘संविधान (123वां संशोधन) विधेयक को 156 के मुकाबले शून्य मतों से पारित कर दिया। बता दें कि लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। संविधान संशोधन होने के नाते विधेयक पर मत विभाजन किया गया, जिसमें सभी 156 सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया।

विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि इस विधेयक के पारित होने के बाद राज्यों के अधिकारों के हनन होने के संबंध में कुछ सदस्यों ने जो आशंका व्यक्त की है, वह निर्मूल है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की केंद्रीय और राज्य सूची एक समान होती है, लेकिन ओबीसी के मामले में यह अलग अलग है।

उन्होंने कहा कि राज्य अपने लिए ओबीसी जातियों का निर्णय करने के बारे में स्वतंत्र हैं। इस विधेयक के कानून बनने के बाद यदि राज्य किसी जाति को ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल करना चाहते हैं तो वे सीधे केंद्र या आयोग को भेज सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘मैं आश्वस्त करता हूं कि आयोग की सिफारिशें राज्य के लिए बाध्यकारी नहीं होंगी।’’ भारत के संविधान का और संशोधन करने वाले, लोकसभा द्वारा यथापारित तथा संशोधन के साथ राज्यसभा द्वारा लौटाए गए विधेयक में पृष्ट एक की पंक्ति एक में ‘अड़सठवे’ के स्थान पर ‘उनहत्तरवें’ शब्द प्रतिस्थापित करने की बात कही गई है।

इसमें कहा गया है कि इसमें खंड तीन के पृष्ठ 2 और पृष्ठ 3 तथा खंड 3 का लोप किया जाए तथा इसके स्थान पर राज्य सभा द्वारा किए गए संशोधनों में पृष्ठ 2 और 3 पर निम्नलिखित संशोधन अंत: स्थापित किया जाए: संविधान के अनुच्छेद 338क के बाद नया अनुच्छेद 338ख अंत: स्थापित किया जाएगा। इसमें सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो के लिये राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग नामक एक नया आयोग होगा।

संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अध्यधीन आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होंगे। इस प्रकार नियुक्त अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा शर्ते एवं पदावधि ऐसी होगी जो राष्ट्रपति नियम द्वारा अवधारित करे। आयोग को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी।

आयोग को संविधान के अधीन सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो के लिये उपबंधित सुरक्षा उपाय से संबंधी मामलों की जांच और निगरानी करने का अधिकार होगा। इसके अलावा आयोग पिछड़े वर्गो के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में भाग लेगा और सलाह देगा। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने संबंधी विधेयक पूर्व में लोकसभा में पारित हुआ था और राज्यसभा ने इसे कुछ संशोधनों को पारित किया था।

 

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