एटीएम तो सुना था ये पेटीएम क्या चीज़ है?

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फुटपाथों पर ठेला लगाने वाले, रोजमर्रा की दिहाड़ी मजदूरी करने वाले और आम राहगीर नोटबंदी के फैसले के बाद अपनी जिन्दगी को किस तरह से चला रहे है इस पर जनता का रिर्पोटर अलग-अलग जगह जाकर जब उनसे बातचीत की तो पाया कि विज्ञापनों और घोषणाओं में केशलैस इकाॅनमी की बातें जिस तरह से सरकार बता रही उसका ज़मीनी स्तर से कोई लेना देना ही नहीं है।

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नोटबंदी को लेकर तमाम तरह बातें हमारे चारो तरफ है। पीएम मोदी बता रहे है लोगों को थोड़ी परेशानी है बाकि सब ठीक है। जनता का रिर्पोटर ने दिहाड़ी कामगारों से बातचीत की तो कई तरह के खुलासे हमारे सामने आए। बुलंदशहर, खुर्जा, और नोएडा जैसी जगहों पर ये लोग नोटबंदी के बाद से किस प्रकार अपने रोजमर्रा कामधंधों को चला रहे है इस पर एक रिर्पोट।

मुगंफली का ठेला लगाने वाला दुकानदार बताता है कि अब ग्राहकों ने आना बिल्कुल कम कर दिया है। रोजमर्रा की दुकानदारी कम से कम 80 प्रतिशत तक घट गई है। अगर 6 से 8 हजार रूपये कमा लेते थे तो अब 1 से 2 हजार रूपये तक दुकानदारी सिमट कर रह गई है। वहीं कपड़ों की सिलाई करने वाले एक बड़े मियां बताते है कि कपड़े सिलाने के बाद कोई उन्हें लेने ही नहीं आ रहा जब पैसे होंगे वो ले जाएगें अब ऐसे में हम लोग क्या खाए।

इसके बाद नोएडा एनसीआर में जब लोगों से बात की तो वहां ये पुछे जाने पर कि आप पेटीएम से पैसा ले लेते हो तो एक चाट बेचने वाला कहता है कि ये पेटीएम क्या होता है। हमे तो मालूम ही नहीं हैं। एटीएम तो सुना है पेटीएम क्या चीज़ है। वहीं दूसरा मजदूर बताता है कि हम इतने पढ़े लिखे तो है नहीं कि ये पेटीएम वेटीएम चला पाए।

पीएम मोदी हर दिन अपने भाषणों में देश को केशलैश इकाॅनमी की और ले जाने की बात कह रहे है ऐसे में ज़मीन सच्चाई कुछ और ही बंया कर रही है।

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