राजौरी गार्डन की हार: दिल्ली के मुख्यमंत्री को 2015 के पहले का अरविन्द केजरीवाल बनना होगा, वर्ना….

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हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम आश्चर्यजनक नहीं थे, लेकिन टीवी चैनलों ने इसे मोदी लहर दिखाने के लिए कई जोरदार प्रयास किए। फिलहाल तो परिणामों के बीच सभी की नज़र दिल्ली की एक ही सीट पर टीकी हुई थी, वो थी राजौरी गार्डन की सीट जिसका परिणाम दिल्ली के उपचुनाव में देखने को मिला।

कर्नाटक में कांग्रेस एक बहुत पुरानी पार्टी रही है, जिसके चलते कांग्रेस पार्टी ने गुंडलुपेट और नानजंगुद सीटें आराम से जीत ली। जबकि राजस्थान में भाजपा की सरकार है जिसके चलते राजस्थान में ढोलपुर सीट पर भाजपा ने असानी से जीत हासिल कर ली। इसी तरह मध्य प्रदेश में भी भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सीटों को बरकरार रखने में कामयाब रहे। वहां पर बांधवगढ़ सीट से BJP के शिवनारायण सिंह ने जीत हासिल की और वहीं अटेर विधानसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी हेमंत कटारे जीते।

इसी तरह बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस का एक गढ़ हैं, पार्टी ने कंट्री दक्षिण सीट को से जीत लिया। जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भाजपा की लिटिपारा सीट जीतने की कोशिशों को विफल कर दिया। हिमाचल प्रदेश में भी, अपने पिता ईश्वर दास धिमान की मौत के बाद बीजेपी के अनिल धीमान ने भोरंज सीट जीती।

लेकिन सबसे चौंकाने वाला परिणाम जो आया वो दिल्ली के राजौरी गार्डन का था। जहां भाजपा के मंजिंदर सिंह सिरसा ने जीत हासिल की और वो सीट 2 साल पहले आम आदमी पार्टी ने जीती थी। राजौरी गार्डन सीट से कांग्रेस दूसरे स्थान पर और आम आदमी पार्टी तीसरे स्थान पर रही साथ ही ‘आप’ उम्मीदवार की जमानत भी जब्त हो गई।

राजौरी सीट आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक जरनैल सिंह के इस्तीफा देने के बाद खाली हुई थी। मात्र दो साल पहले एक ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी को इस हार को लेकर चिंता करनी चाहिए, विशेषकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को।

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खास बात यह है कि, आम आदमी पार्टी दिल्ली में होने वाले निकाय MCD चुनावों को लेकर एक बार फिर से 2015 के विधानसभा चुनावों के अपने प्रदर्शन को दोहराने की उम्मीद कर रही है। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि, पार्टी ने इस बार मतदाताओं का भरोसा क्यों गंवा दिया। जिन्होंने सिर्फ दो साल पहले कांग्रेस का पूरा और भाजपा का तक़रीबन सफाया कर दिया था।

दिल्ली और अन्य जगहों पर आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट का सबसे बड़ा कारण यह है कि आम आदमी का सही प्रतिनिधित्व करने वाली एक पार्टी होने की अपनी धारणा को धीरे धीरे गंवाती नज़र आ रही है। । पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर आरोप है की सत्ता में आने के फ़ौरन बाद ही उन्होंने वालंटियर्स का तिरस्कार शुरू कर दिया। यही आरोप दिल्ली में लगे और पंजाब में भी वालंटियर्स ने कुछ इसी तरह की चिन्ताओं का इज़हार किया।

मेरी चुनावों की रिर्पोटिंग को कवर करने की यात्रा के दौरान पंजाब में एक स्वयंसेवक ने बताया था कि, दिल्ली चुनावों में पार्टी के जीतने से पहले उनकी दिल्ली के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंच थी, लेकिन बाद में पार्टी की जीत के बाद, एक साधारण से नेता ने भी एक राजा की तरह बर्ताव करना शुरू कर दिया। जिससे उनके पास सीधी पहुंच समाप्त हो गई थी,

उन्होंने कहा, “हम अब उन तक  सेक्रेटरीज के माध्यम से जाने की ही उम्मीद रख सकते है। यहीं नहीं इनके निजी सहायकों के भी निजी सहायक है, जिसकी वजह से वह लोग अपने स्वयंसेवकों तक पहुंच नहीं पा रहे थे, जिन्होंने दिल्ली में ऐतिहासिक जीत को दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।”

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की जीत के पीछे अरविन्द केजरीवाल की राजधानी में रह रहे लोगों तक संवाद पहुंचाने की शैली का बड़ा योगदान था। उनकी इसी की वजह से से दिल्ली वासियों ने उन्हें एक और मौक़ा देने की ठानी थी। वरना 2013  में कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के बाद मात्र 49 दिनों में सरकार छोड़ देने के बाद उनके विरोधियों और मीडिया के एक वर्ग ने उन पर भगोड़ा होने का आरोप लगाया था। भगौड़े की अपनी छवि को समाप्त करने के लिए ये बेहद मुश्किल कार्य था, लेकिन केजरीवाल ने इसे कर दिखाया। उन्होंने हर वर्ग और उसकी परेशानी के साथ जुड़ने की मुहिम और अपने दृढ़ निश्चय के बल पर दिल्ली में ऐतिहासिक परिणाम हासिल करके दिखाए।

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जन संपर्क की मुहीम दिल्ली चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के लिए सबसे खास बात थी, जिसे पार्टी ने सरकार बनाने के तुरंत बाद छोड़ दिया। लोगों से सीधे जुड़ने के तरीके को उन्होंने बदल दिया था और इसके बदले मंहगे अभियान को अपनी रणनीति में शामिल किया जो टीवी व अन्य प्रचार कैम्पेन थे। जिसके चलते केजरीवाल सरकार ने विज्ञापन के लिए 526 करोड़ रुपये की भारी राशि को मंजूरी दी।

सरकार ने अपनी छवि को बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने के लिए महंगे पीआर फर्मो को किराए पर लिया। लेकिन कोई भी यह नहीं समझ सका कि केजरीवाल सरकार को लोगों के साथ जुड़ने के लिए महंगे विज्ञापन अभियान की आवश्यकता क्यों पड़ी?

सरकार में आने के बाद एक और ख़ास बात ये हुई के केजरीवाल ने खुद को अपने शुभचिंतकों की जगह तथाकथित सलाहकारों से घेरना ज़्यादा बेहतर समझा।  ये वह सलाहकार थे जो एक मोती तनख्वाह पर काम कर रहे हैं और उनकी ज़िम्मेदारियों में से एक अहम् ज़िम्मेदारी सोशल मीडिया पर उन लोगों पर हमले बोलना हैं जो सरकार की कार्यशैली या ख़राब परफॉरमेंस पर सवाल उठाने की हिम्मत करे।

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उन तथाकथित सलाहकारों पर इलज़ाम लगे कि खुद को केजरीवाल के सामने महत्वपूर्ण बनाये रखने केलिए उन्होंने ने सर्कार या पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाने वालों पर व्यक्तिगत हमले भी किये। और इस तरह से सैंकड़ों के तादाद में आम आदमी के स्वयंसेवक और शुभचिंतक धीरे धीरे पार्टी से दूर होते चले गए।

मुझे संदेह है कि इन्हीं  तथाकथित सलाहकारों ने केजरीवाल को गोवा और पंजाब में ज़मीनी हकीकत से दूर रखा और उन्हें दोनों राज्यों में जीत के झूठे सपने दिखाते रहे। क्यूंकि ज़मीनी हकीकत इन दोनों ही राज्यों में बिलकुल विपरीत थी। मैंने पिछले साल अपने आंकलन में कहा था कि अगर गोवा में ‘आप’ एक भी सीट जीत जाती है तो मुझे आश्चर्य होगा। जब मैंने गोवा में फेसबुक लाइव के लिए केजरीवाल से मुलाकात की थी तो, उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के पक्ष में लहर है।

मेरी पंजाब चुनाव की यात्रा के दौरान और बाद में भी मैंने कहा कि यह कांग्रेस है न कि आम आदमी पार्टी जो 59 के जादुई आंकड़े को पार करने की संभावना रखती है, इस पर मेरी खिल्ली उड़ाई गयी और कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि में निष्पक्ष होने की ज़बरदस्त कोशिश कर रहा हूँ।

मेरा मानना है कि अगर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को राजनीति में प्रासंगिक रहने की जरूरत है, तो इसके लिए एक त्वरित सुधार की आवश्यकता होगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री को 2015 के विधानसभा चुनावों से पहले वाले अरविंद होने के लिए वापस लौटना होगा। उन्हें खुद को उन लोगों की टोली से खुद को आज़ाद करना होगा जो सलाहकार कम और स्वार्थी चापलूस ज़्यादा हैं।

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