अरविंद गौड़ ने दिल्ली सरकार पर लगाया नाटकों में हस्तक्षेप करने का आरोप, कहा- “सत्ता के लिए हम तो भांड हैं, पैसे दो कुछ भी करवा लो”

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प्रख्यात थिएटर निर्देशक और संस्कृतिकर्मी अरविंद गौड़ ने दिल्ली सरकार पर नाटकों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाते हुए दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को एक पत्रकर खरी-खरी सुनाया है। गौड़ ने सिसोदिया को लिखे अपने पत्र में कहा है कि सत्ता के लिए हम तो भांड हैं, आप पैसे दो और कुछ भी करवा लो।अरविंद गौड़ ने सिसोदिया को लिखे अपने पत्र में कहा है, “मनीष भाई, साहित्य कला परिषद, दिल्ली के ताज़ा विज्ञापन में आपकी फोटो के साथ दो थियेटर फेस्टिवल की सूचना छपी है। उसमें लिखे एक नियम में साहित्य कला परिषद के सचिव ने लिखा है कि सरकारी संस्था द्वारा ‘निर्धारित विषयों’ पर ही नाटक करने हैं। मतलब अगर फेस्टिवल में आवेदन करना हो तो, नाट्यकर्मियों को आपकी सरकार द्वारा दिए गए विषयों या एजेंडे पर ही नाटक करना होगा।”

गौड़ आगे लिखते हैं, “सवाल है कि आप की सरकार ने नाट्यकर्मियों को इस लायक भी नहीं समझा कि वे खुद तय कर सकें कि उन्हें किन इश्यूज पर नाटक करना है? मतलब उन्हें नहीं पता कि नाटकों के माध्यम से वे कैसे अपने समय और समाज से जुड़ सकते हैं? यानि अब सरकार के दिशा निर्देश के तहत ही नाटक के विषय होंगे? अब सरकार तय करेगी कि हमें क्या और कैसे नाटक करने हैं?”

उन्होंने अपने पत्र में आगे लिखा है, “दोस्त, यह कला की स्वयत्तता के लिए खतरनाक और गलत परंपरा की शुरुआत है। नाटक आपके हिसाब से नहीं चलेंगे, सरकार तो आती जाती रहेगी। पर रंगमंच हमेशा है और रहेगा। कृपया कला की स्वंतत्रता को नियंत्रित न करें। आप अपने तय एजेंडे के अनुरूप विषयों पर नाटक न करायें। कला की स्वतंत्रता को खत्म न करें।”

अरविंद गौड़ ने सिसोदिया के नाम लिखे अपने पत्र में आगे कहा है, “आपने वाट्सअप मैसेज में मुझे लिखा कि
सरकार अगर कोई ज़रूरत महसूस करे और रचनाकार से उस विषय पर कुछ रचना तैयार करने के लिए कहे तो इसमें किसी को आपत्ति क्यों हो? सरकार में बैठ कर मुझे लगता है कि रचनाकार इन मुद्दों पर भी लिखेंगे तो सरकार जनजागरूकता के लिए उन रचनाओं के माध्यम से भी आगे बढ़ेगी। (मनीष सिसोदिया)”

उन्होंने कहा कि, “मनीष भाई, सरकार की जरूरत के कथित आग्रह पर आप अलग से काम कर सकते हैं। आपके संदेश से सवाल यह भी उठता है कि क्या अभी तक रंगकर्मी मुद्दे विहीन नाटक कर रहे थे? क्या सही है क्या गलत, हमें अभी तक पता ही नही था?? अब आप हमें दिशा देकर कृतार्थ करेंगे? सत्ता में बैठ ऐसी ग़लतफ़हमी कम से कम आपको तो नही होनी चाहिए।”

मशहूर रंगकर्मी ने आगे लिखा है, “साहित्य कला परिषद के भरत मुनि रंग महोत्सव और युवा नाट्य महोत्सव में विषय की यह शर्त लगा आप रंगकर्मी की स्वायत्तता के हक को बाध्य कर रहे हैं। महोत्सव में आर्थिक पक्ष हटा दीजिए। फिर देखिए कितने रंगकर्मी आपके मुद्दों पर काम करते हैं!! आपके इसी तर्क पर जब भाजपा अपनी जरूरत के अनुरूप पाठ्यक्रम में कुछ जोड़ती है या अपनी ‘जरूरत’ के मुताबिक इतिहास में संशोधन या बदलाव करती है तो हम/आप आपत्ति क्यों करते हैं?”

“भाजपा और आप की सरकार की ज़रूरत के मुददों में अंतर जानता हूँ पर तर्क दोनों का एक ही क्यों है? दरअसल इसके लिए आपको लेखकों की कार्यशाला करनी चाहिए कि वे आपके दिए विषयों पर लिखें फिर रंगकर्मियों को तय करने दीजिए कि उन्हें क्या करना है। करना भी है या नही? इतनी आजादी उन्हें दीजिये। हाँ, मुझे साहित्य कला परिषद के बारे में कुछ कहना या लेना देना नहीं है। कला के नाम पर वह तो एक नाकारा और भ्रष्ट तंत्र है, जिसे न कपिल मिश्रा ने सुधारा न आपने समझा।”

उन्होंने आगे लिखा है, “मनीष भाई मुझे आपकी नीयत पर कोई शक नहीं है, पर आपके इसी तर्क का सहारा लेकर जब कोई और अपनी ज़रूरत हम पर लादेगा तब हम उसका विरोध किस नैतिक आधार पर करेंगे? सबसे महत्वपूर्ण बात- दुनिया के इतिहास में जब भी रचनात्मकता को सत्ता या सरकार ने दिशा निर्देश जारी किए, तब-तब दोयम दर्जे का काम सामने आया है। आपातकाल से लेकर छद्म राष्ट्रभक्ति तक इसके उदाहरण सामने हैं।”

दिल्ली सरकार को दिया सुझाव

अपने पत्र में अरविंद गौड़ ने दिल्ली सरकार को कुछ सुझाव भी दिए हैं जो इस प्रकार है:-

1- कुछ बेहतरीन नाटक जो इन्हीं विषयों के करीब हों, (सरकार की जरूरत के हिसाब से हों) चुन कर उन्हें दे सकते थे। पर आपकी skp समिति में इतने समझदार कहाँ हैं?

2- आप साहित्य कला परिषद के इस गैर लोकतांत्रिक फैसले की समीक्षा करें। निवेदन है कि विषय की बाध्यता वाले नियम को तुरंत हटाएं।

3- याद रखें कि वैकल्पिक राजनीति के लिए सार्थक सांस्कृतिक नीति की भी जरूरत होती है। आपने आन्दोलन में नाटक की ताकत देखी है।

4- रंगमंच की समस्याएं ढेर सारी हैं। फेस्टिवल करने या फीते काटने से कला संस्कृति का विकास नही होता। उसके लिए बिना आग्रह पूर्वाग्रह के संवाद करना होगा।

5- सिर्फ पसंदीदा लोगों की मीटिंग्स बुला कर कुछ हासिल नहीं होगा। इस पहलू पर भी ध्यान दीजिए। समस्याओं को हल करें न कि नए फैसले लादें।

उन्होंने आखिरी में लिखा है कि “मनीष भाई एकतरफा फैसले कर उसे लागू करवाना तो स्वराज की किताब में भी कहीं नहीं लिखा है। अगर आप चाहें तो कभी भी स्वायत्तता के विषय पर खुले मंच से मुझसे संवाद कर सकते हैं। उन आपके सकारात्मक जबाब के इंतजार में आन्दोलनों का आपका पुराना साथी। अरविन्द गौड़!!

एक और पत्र में सुनाई खरी-खरी

अरविंद गौड़ ने एक और पत्र में दिल्ली सरकार को खरी-खरी सुनाते हुए लिखा है, “मेरे सवाल विषय पर नहीं, उनके अनिवार्य होने पर हैं। यह थियेटर फेस्टिवल है ,कोई प्रोजेक्ट नहीं है कि आप विषय दें। दिल्ली में पिछले 32 साल से सक्रिय हूँ, पर किसी भी पार्टी की सरकार ने दिल्ली युवा महोत्सव में विषय की पाबंदी नहीं रखी।
रंगकर्मी मूर्ख नहीं है कि उसे सामाजिक मुद्दों की समझ न हो।”

उन्होंने आगे लिखा है, “यह ग़लत परम्परा है। कोई अगर गिरीश कर्नाड का नाटक करना चाहता है या भीष्म साहनी का या जयशंकर प्रसाद, या Rajesh Kumar का तो पहले उसे इन नाटकों में निर्धारित मुद्दे तलाशने पड़ेंगे। यानी वो मुद्दे फिट करे। कर भी लेंगे, पर उससे क्या मक़सद हासिल होगा? कल को जब अन्य लोग अपने एजेंडे देंगे तब भी उन्हें स्वीकारेंगेे। मतलब सत्ता के लिए हम तो भांड हैं। पैसे दो कुछ भी करवा लो।”

 

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