बजट उतना ही चुनावी है जितनी प्रधान सेवक की मन की बात!

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आम बजट में आम आदमी के लिए कुछ भी लाभकारी नहीं है। बजट पेश करते समय कुछेक पंक्तियां हिंदी भाषा में बोल देने से वित्त मंत्री की चर्चा तो हुई लेकिन बजट में पेश की गई योजनाओं को कोई ख़ास वाहवाही नहीं मिल सकी। महिलाओं को ख़ाली हाथ छोड़ने वाले इस बजट में पित्र सत्ता की एक अजीब सी बू है।

File Photo: Indian Express

घरों को गैस कनेक्शन देने की योजना को महिला उत्थान से जोड़ने का प्रयास पूर्णता विफल रहा। आज की महिलायें सिर्फ़ चौके में सीमित नहीं है और जो हैं भी वो ये तो नहीं ही मान सकतीं कि गैस कनेक्शन से उनके जीवन में कोई बेहतरी होगी। सरकार की ‘उज्जवला’ योजना को महिला वर्ग से कोई ख़ास शाबाशी नहीं मिली। वित्त मंत्री ने 10 करोड़ ग़रीब परिवारों को पांच लाख तक का स्वास्थ्य बीमा देने की बात भी कही। ये एक अच्छी पहल हो सकती थी यदि गांवों में अस्पताल और अस्पतालों में डॉक्टर होते।

ग़ौरतलब ये भी है कि सरकार ने केवल बीमा देने की योजना बनाई है न कि पांच लाख तक के इलाज को मुफ़्त किया है। बीमा का आम नियम ये है कि इलाज पे पहले ख़र्च होता है और बाद में बीमा कम्पनी आप के ख़र्च के काग़ज़ों की परख करती है। यदि काग़ज़ ठीक पाए जाते है, तब आपका ख़र्च किया हुआ पैसा आपको वापस मिलता है। यहां कई सवाल खड़े होते हैं:-

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जो ग़रीब बीमार है वो पहले ख़र्च करने के लिए पैसा कहां से लाएगा? क्या इस पहल का ज़्यादा फ़ायदा प्राइवेट अस्पताल और बीमा कम्पनियों को नहीं होगा? ग़रीब आदमी, जो ज़्यादातर कम पढ़ा-लिखा होता है, बीमा कम्पनी को सब काग़ज़ कैसे जमा कराएगा? बीमा कम्पनी को काग़ज़ जमा करने में तो बड़े-बड़े तीस मार खाँ भी असक्षम रहे हैं फिर ग़रीब आदमी ये काम कैसे करेगा?

ग्रामीण और कृषि के क्षेत्र में सरकार की कथनी और करनी में चौंका देने वाला अंतर पाइएगा। सरकार के खाद्य निगम की वेबसाइट  के अनुसार, जहां गेहूं का न्यूतनम समर्थन मूल्य लगभग 1600 रुपये है, वहीं प्रति क्विंटल लागत 2,400 रुपय है। ये किस लिहाज़ से डेढ़ गुना है? इससे भी बड़े कई प्रश्न हैं। जैसे, सरकार ने लागत की क़ीमत इतनी कम क्यूं तय की है? न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाने की ओर क्या क़दम उठाए जा रहे हैं? डेढ़ गुणा की गिनती सरकारी कैल्क्युलेटर से होगी या आम आदमी अपने गणित से इसे जोड़ सकता है, वग़ैरह वग़ैरह…।

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वित्त मंत्री जी ने “हवाई चप्पल” पहने लोगों पे चुटकी लेते हुए कहा की आज कल वे भी हवाई जहाज़ में यात्रा करने लगे हैं। ये ही शायद वे गुमशुदा अच्छे दिन थे जिनके सपने 2014 में दिखाए गए थे। लेकिन अगर सच में हवाई चप्पलधारी लोगों के दिन बेहतर हुए होते, तो शायद वे एक जोड़ी जूता तो ख़रीद ही लेते। दरअसल, सरकार ने रेल किरायों में इतना इज़ाफा कर दिया है कि आम आदमी को हवाई यात्रा की ओर रूख करना पड़ रहा है।

शायद कोई ये कहे कि सरकार की वजह से प्राइवेट एयरलाइन के अच्छे दिन आ गए हैं लेकिन आम आदमी आज भी चप्पल ही घिस रहा है। कुछ समय पहले जब हज यात्रा से सरकार ने सब्सिडी हटाई थी तो आश्वासन ये था कि धीरे-धीरे सभी धर्मों की यात्रा से सब्सिडी हटाई जाएगी।

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मेरी व्यक्तिगत उम्मीद थी कि बजट में वित्त मंत्री कैलाश-मानसरोवर यात्रा या और किसी यात्रा से सब्सिडी हटाएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जब कि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से इन विशाल पहाड़ों पे यात्रा कम से कम होनी चाहिए ताकि वे पाकीज़ा रहें और मनुष्य वहां कूड़ा-कचरा ना फैलाए। ना कल ऐसी कोई बात हुई, ना ही किसी ने सरकार से ये सवाल किया।

कुछ नए कौशल केंद्र खुलेंगे। कुशलता पाकर भी युवा बेरोज़गार रहेंगे, क्यूंकि नौकरियां कम कर दी गयीं हैं। कुशलता ख़ुशी का कारण ना बनकर, खीज और बेबसी में तब्दील हो जाएगी। रोज़गार के बोझ से जूझते आम आदमी के लिए सांसदों का वेतन बढ़ने की घोषणा को गले से उतारना मुश्किल होगा।

भारत माता की…

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘जनता का रिपोर्टर’ उत्तरदायी नहीं है।)

 

 

 

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