जजों की नियुक्ति में अधिकारों पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम आमने सामने

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उच्चतम न्यायालय का कॉलेजियम न्यायाधीश के पद के लिए किसी की उम्मीदवारी खारिज करने और प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) के संशोधित मसौदे में आवेदनों का मूल्यांकन करने के लिए छानबीन समिति गठित करने के सरकार के अधिकार समेत कुछ सरकारी प्रस्तावों पर अपनी आपत्ति दोहरा सकता है।

एमओपी में उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों के लिए दिशानिर्देश होते हैं। इस तरह के संकेत मिल रहे हैं कि भारत के प्रधान न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम को संशोधित मसौदा एमओपी में विवाद वाले उपबंधों को लेकर आपत्तियां हैं जो कानून मंत्रालय ने तीन अगस्त को उसे सौंपा है। इसका अर्थ होगा कि दस्तावेज को अंतिम रूप देने में अभी और समय लगेगा।

संशोधित मसौदे पर विचार-विमर्श करने के लिए आने वाले दिनों में कॉलेजियम की बैठक हो सकती है। संशोधित मसौदे में सरकार ने दोहराया है कि उसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और ‘जनहित’ के आधार पर कॉलेजियम द्वारा सुझाए गए किसी नाम को खारिज करने का अधिकार होना चाहिए।

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मई में कॉलेजियम ने सर्वसम्मति से इस उपबंध को खारिज करते हुए कहा था कि यह न्यायपालिका के कामकाज में हस्तक्षेप के समान है। मार्च के शुरुआती मसौदे में सरकार ने कॉलेजियम को खारिज किए गए नाम फिर से भेजने का अधिकार देने से इनकार किया था, वहीं नए मसौदे के अनुसार सरकार कॉलेजियम को उसकी सिफारिश को खारिज करने के कारण के बारे में बताएगी।

सरकार और न्यायपालिका द्वारा एमओपी को अंतिम रूप दिए जाने की कोशिशों के बीच उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार (12 अगस्त) को कहा कि न्याय प्रदान करने की व्यवस्था का पतन हो रहा है। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के कॉलेजियम के फैसले को लागू नहीं करने को लेकर केंद्र से नाराजगी प्रकट की थी। शीर्ष अदालत ने दो दिन पहले इस संबंध में कहा था कि वह गतिरोध को बर्दाश्त नहीं करेगी और उसे जवाबदेह बनाने के लिए हस्तक्षेप करेगी। प्रधान न्यायाधीश ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ‘हम न्यायाधीशों की नियुक्ति में गतिरोध को बर्दाश्त नहीं करेंगे जिससे न्यायिक कामकाज बाधित हो रहा है। हम जवाबदेही पर जोर देंगे।’

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सीजेआई ठाकुर ने उम्मीदवारों के आवेदनों का मूल्यांकन करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की समिति बनाने के सरकार के कदम को खारिज कर दिया था। जब जून के अंतिम सप्ताह में दस्तावेज का मसौदा तैयार करने वाले मंत्रिसमूह की अध्यक्षता करने वाली विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और तत्कालीन कानून मंत्री डी वी सदानंद गौड़ा ने न्यायमूर्ति ठाकुर से मुलाकात की थी तो उन्होंने संशोधित मसौदा एमओपी में उपबंध को लेकर अपनी आपत्ति प्रकट की थी। लेकिन अब सरकार शीर्ष अदालत के एक फैसले का उल्लेख करते हुए इस बात पर जोर दे रही है कि इस तरह की समिति बनाई जाए। लेकिन उसी समय सरकार ने यह भी कहा है कि सीजेआई और कॉलेजियम इस बारे में फैसला कर सकते हैं कि इस तरह की प्रणाली में किसे शामिल करना है।

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(पीटीआई भाषा)

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