संसद के लिए नहीं बनेगा कोई दिशा-निर्देशः सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका पर विचार करने से इंकार कर दिया, जिसमें बिना किसी बाधा के संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए दिशा-निर्देश की मांग की गई थी।

न्यायालय ने कहा कि उसे अपनी लक्ष्मणरेखा के बारे में पता है। ललित मोदी तथा व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) मामले पर कांग्रेस द्वारा अनुचित ढंग से संसद की कार्यवाही को बाधित करने के मद्देनजर, 12 अगस्त को गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) फाउंडेशन फॉर रिस्टोरेशन ऑफ नेशनल वैल्यूज (एफआरएनवी) ने जनहित याचिका दायर की थी।

प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एच.एल.दत्तू तथा न्यायमूर्ति अमिताव रॉय की पीठ ने दिशा-निर्देश तैयार करने और इस मामले में कानून बनाने की मांग करने वाली याचिका को ठुकराते हुए कहा, “हम अपनी लक्ष्मण रेखा जानते हैं और हमें इसे पार नहीं करना चाहिए।”

एनजीओ की तरफ से उपस्थित वकील रवि प्रकाश मेहरोत्रा से न्यायालय ने कहा, “लोकतंत्र में सांसदों को पता होता है कि उन्हें कैसे काम करना है और हमें उन्हें सिखाने की जरूरत नहीं।”

न्यायालय ने कहा कि सांसदों से यह कहना कि आप इस तरीके से व्यवहार करें या उस तरीके से व्यवहार करें, यह कहना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इस बात से न्यायालय असहमत है कि सांसदों को किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, इसपर कोई कानून नहीं है।

प्रधान न्यायााधीश न्यायमूर्ति दत्तू अपने उस रुख पर कायम रहे, जिसके मुताबिक कार्यवाही के संबंध में परामर्श प्रदान करना सर्वोच्च न्यायालय का कार्य नहीं है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने साफ शब्दों में संसद की कार्यवाही में अवरोधों पर चिंता व्यक्त की थी।

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