छत्तीसगढ़: वे देखती नहीं, सुनाती हैं मधुर राग

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छत्तीसगढ़ की राजधानी में रहने वाली रूपवर्षा, सरिता, रानू और नीलम अपनी आंखों से दुनिया नहीं देख पातीं, लेकिन ये बालिकाएं अपनी आवाज के जादू से लोगों को मुग्ध कर देती हैं। गायन और वादन में पारंगत इन बच्चों का एक छोटा सा आर्केस्टा ग्रुप भी है।

हम बात कर रहे हैं मठपुरैना स्थित ‘शासकीय दृष्टि और श्रवण बाधितार्थ स्कूल’ के दृष्टिहीन बालिकाओं की। ये सधे हुए सुर-ताल में जब गाना शुरू करते हैं, तो सुनने वाले संगीत की दुनिया में खो से जाते हैं। गाने जिस राग के होते हैं, श्रोता उसी भाव से सराबोर हो जाते हैं। इस स्कूल के बालक-बालिकाओं की ख्याति अब छत्तीसगढ़ सहित पड़ोसी राज्यों तक फैलने लगी है।

गायन और वादन में पारंगत ये बच्चे एक छोटा सा आर्केस्टा ग्रुप भी चलाते हैं। इनके आर्केस्टा ग्रुप को कई विशेष मौकों पर मुख्यमंत्री निवास में कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए भी आमंत्रित किया जाता है। विभिन्न शासकीय कार्यक्रमों और कई निजी कार्यक्रमों में इस आर्केस्टा ग्रुप को गीत-संगीत के लिए बुलाया जाता है।

पिछले वर्ष 3 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय नि:शक्तजन दिवस के अवसर पर जिला मुख्यालय राजनांदगांव में आयोजित राज्यस्तरीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में इन बच्चों को आर्केस्टा के लिए विशेष रूप से बुलाया गया था। कार्यक्रमों में इन प्रतिभाशाली बच्चों को सम्मानित भी किया जाता है।

इस स्कूल में 11वीं कक्षा की सरिता देवांगन रायपुर की रहने वाली है, जबकि कक्षा 9वीं की छात्रा रूपवर्षा जशपुर से, कक्षा 11वीं की रानू बेमेतरा से और इसी कक्षा की नीलम दंतेवाड़ा से यहां पढ़ने आई हैं।

ये जब गाती हैं- ऐ मालिक तेरे वंदे हम.., ऐ मेरे वतन के लोगों.., इतनी शक्ति हमें देना दाता.., सूरज की गर्मी से तपते हुए तन को मिल जाए तरुवर को छाया.., रैना बीती जाए.., छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए.. जैसे लोकप्रिय और प्रसिद्ध भजन, गजल और खूबसूरत फिल्मी गीत तब सुनने वाला तल्लीन हो जाता है। वाकई ये बच्चे सुर-ताल का जादू बिखेरने में माहिर हैं।

इन बालिकाओं के अलावा कक्षा दसवीं में अध्ययनरत सरायपाली के विनय और कक्षा आठवीं में अध्ययनरत बालोद के यादेश्वर की आवाज भी बहुत खूबसूरत है।

यहां वाद्य यत्रों का वादन करने वाले बालकों का नाम लेना भी जरूरी है, तबला वादक कक्षा 11वीं के लक्ष्मण (बिलासपुर) और कक्षा नौवीं के शशि (कबीरधाम) के हाथों की थाप जब तबले पर पड़ती है, तो मन झनकार उठता है।

कक्षा 11वीं के प्रहलाद (बिलासपुर) की अंगुलिया जब हारमोनियम पर पड़ती है, तब सुरों की सरगम सज उठती है। इसके अलावा कक्षा दसवीं के कमलकांत (जांजगीर-चांपा) केसियो और कक्षा 10वीं के छत्तर कुमार (गरियाबंद) ढोलक बजाने में पारंगत हैं।

मठपुरैना स्थित दृष्टि और श्रवण बाधित बच्चों के इस स्कूल में पढ़ाई के साथ उनकी रुचि के अनुरूप गायन-वादन का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। आज संगीत की विधा में पूरी तरह से पारंगत हो चुके ये बच्चे न सिर्फ सूबे में, बल्कि पूरे देश में अपनी कला का जादू बिखेर कर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन कर रहे हैं।

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