‘कृपया देश का सम्मान किसी के कहने भर से मिटटी में न मिलाये’

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ऋचा वार्ष्णेय

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने शनिवार को कहा कि प्रधान मंत्री का पाकिस्तान जाना इस बात का प्रमाण है कि भारत में असहिष्णुता नहीं है। पिछले कई सप्ताह से भारत में असहिष्णुता के मुद्दे पर लम्बी बहस चली कि क्या भारत में वाक़ई मोदी राज में असहनशीलता बढ़ी है?

तो आखिर ये असहिष्णुता है क्या? इसका अभिप्राय है कि किसी बात को शालीन न रहकर स्वीकारना या सहन नही करना और जहाँ तक बात भारत की है तो जानिये कि भारत सहिष्णुता का एक बेहतरीन उदहारण है जहाँ 3,००० जातियाँ एवं लगभग 25,००० उपजातिया 22 मुख़्य भाषाए एवं 1599 अन्य भाषाए बोली जाती हैं अर्थात भारतवासी हर भाषा एवं वर्ग जाति का सम्मान करते हैं एक नही करोड़ों उदहारण हैं हमारी एकता में अनेकता के।

असहिष्णुता सिर्फ राजनीति या समाज में नही बल्कि निजी जीवन में भी बहुत बड़ी हैं। देश में बढ़ते हुए तलाक,पारवारिक कलह एवं रोज़ रोज़ के लड़ाई झगडे इत्यादि हमारी असहिष्णुता को दर्शाते हैं और ऐसा मेरा मानना है कि ये सिर्फ राजनीति की वजह से नहीं बल्कि मानसिकता है हम मानसिक रूप से अधिक आक्रोशित हुए हैं।

रहा सवाल राजनीतिक असहिष्णुता का तो पहले कांग्रेस पार्टी का बोल बाला था और मुख्य 2 समुदाय थे। फिर धीरे धीरे उनकी कमियाँ उजागर हुई और सब लोग एक जुट होकर उस पार्टी पर व्यंग करते थे क्यूंकि सब एक जुट थे तो वह व्यंग व्यंग की तरह ही लिया जाता था पर अब जब लोग 3 पार्टियो या वर्ग में बंट गए है तो एक दूसरे पर हुए व्यंग को लोग संवदेनशील होकर आपस में कर्कश भाषा का इस्तेमाल करते हैं। शाब्दिक के अलावा शारीरिक रूप से लड़ने लगते हैं। लोगों ने पार्टी को देश से भी ऊपर मानना शुरू कर दिया है।

जो ग़लत है क्यूंकि देश सर्वोपरि होना चाइये हमारी अहम एवं पार्टी से भी ऊपर। रहा सवाल धार्मिक असहिष्णुता का तो याद रखिये ये देश सभी का है। सभी समुदाय ने जब एक साथ मिलकर अंग्रोजो के विरुद्ध युद्ध किया तो अंग्रोजो को देश छोड़ना ही पड़ा और आगे भी हम सभी मिलकर ही सारी प्राक़तिक और सामजिक आपदाओ से इस भारत भूमि को बचाएंगे।

कोई भी बीमारी या प्राकृतिक आपदा जाति वर्ग पर नही समूचे देश पर आती है और कोई नेता नही बल्कि हम आप मिलकर एक दूसरे को बचाते हैं।

चेन्नई में जब बाढ़ से भयावह स्थिति पैदा हुई और सैंकड़ों लोग मारे गए तो हर धर्म के लोगों ने मानवता की ऐसी मिसाल पेश की जिससे हर भारतीय का सर गर्व से ऊपर हो गय।

हमने देखा कि किस तरह एक हिन्दू परिवार ने एक मुस्लिम परिवार को न सिर्फ अपने घर में जगह दी बल्कि अपने घर में नमाज़ पढ़ने केलिए विशेष व्यवस्था की।

हमने ये भी देखा कि किस तरह एक मुस्लिम युवक ने एक गर्ववती हिन्दू महिला को समय रहते अपनी नाव में हस्पताल लेजाकर उस की जान बचाई। और जब उस महिला ने उस शिशु को जन्म दिया तो उसने अपनी बेटी का नाम उस मुस्लिम युवक के नाम पर रखने का फैसला किया।

और भी इस तरह की अनेक उदाहरण देखे देखे गए जिसने भारत की अनेकता में एकता वाली पहचान को उजागर किया।

रहा सवाल टीवी इत्यादि पर दिखाए गए भाषणो एवं व्यान वाज़ी का तो ये सब छलावे हैं ये राजनेता हमारी जाति इत्यादि के लिए सहानुभूति दिखा कर मतदान पाने के लिए ही ऐसा बोलते हैं, बस क्यूंकि ये जानते हैं जब तक हम जातिबाद के झांसे में फंसे रहेंगे तब तक इनके ख़ज़ाने भरते रहंगे जिस दिन हमको इस बात को समझ लिया और हमने विकास,शिक्षा एवं भस्टाचार के खिलाफ मिलकर युद्ध छेड़ा तो इनके ख़ज़ाने भरने बंद और देश के हर आम आदमी की जीवन दशा सुधर जायेगी।

और यदि आपको लगता है कि नही मेरी राजनितिक पार्टी मेरी जाति का उत्थान करने के लिए है तो फिरसे सोचिये कि आपकी जाति में लोग वाकई कितने शिक्षित और विकसित हो चुके, उनका जीवन स्तर कितना सुधर चुका है, खाने पीने की वस्तुये और आवश्यकता की सामिग्री कितनी सही दामो में मिलती है?

यदि आप गौर से देखें कि वर्तमान पार्टी पिछली पार्टी का जिन जिन कारणों से विरोध करती थी आज वो सारे के सारे काम में पिछली पार्टी इनका विरोध करती है तो मतलब सब एक ही जैसे है। अगर अभी नही तो समझे की आप अभी तक नफरत के छलावे में फसे हुए हैं
किसी को गिराना या दबाना जितना आसान है अपनों को उठाना और संभाले रखना उतना ही मुश्किल।

अब बात आती है किसी कलाकार या अभिनेता के बयान की, अगर हम समझदारी से काम लेते और उसकी कही हुई बात को उपेक्षित कर देते तो वो गलत सिद्ध होता और भारत सहिष्णु, परन्तु उसकी बात को इतनी महत्त्वता देकर हमने उसकी पत्नी सोच को सही साबित कर दिया अपने शब्दो से।

किसी के कहने भर से न तो ये देश असहिष्णु होगा न ही हो सकता है परन्तु अपनी असहनशीलता एवं मुर्खपूर्ण हरकतों से जरूर।

कृपया देश का सम्मान किसी के कहने भर से मिटटी में न मिलाये, शालीनता के साथ स्वीकार की गई असहमति को ही सहिष्णुता कहते हैं अब खुद को आंकिए कि आप सहिष्णु या असहिष्णु।

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