राजीव मरते नहीं, राजीव मरा नहीं करते

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निलेश शेवगाँवकर

शुरुआत पिछली सदी से करना चाहता हूँ. मई 1991 की एक रात थी जब इस देश के सपने छिन्न भिन्न होकर श्रीपेरम्बदूर के एक मैदान में बिखर गए थे.

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एक राजनैतिक षड्यंत्र के तहत पहले 1989 में एक राष्ट्रनायक को बदनाम किया गया. उस पर दलाली के झूठे आरोप लगाए गए और जनता में अविश्वास फैला कर गुमराह किया गया. अराजकता फैलाई गयी और उसके करीबियों ने उसे सत्ता से बेदखल कर दिया. अराजक सरकार अस्तित्व में आई.

विरोधियो का एक महारथी रथ लेकर निकला. निशाने पर थे सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक सारे शहर. रथ जहाँ से गुज़रा वहाँ साम्प्रदायिक हिंसा हुई, लोग मारे गए. कत्लेआम हुआ.

राजीव मरते नहीं …..राजीव मरा नहीं करते
राजीव आज भी उस दौर के युवाओं के दिल में धड़कते हैं..धडकते रहेंगे

झूठ पर आधारित अवसरवादी सरकार का गिरना तय था लेकिन देश में राजनैतिक स्थिरता के लिए राष्ट्रनायक ने एक अन्य अल्पमत सरकार को समर्थन देना तय किया. बदले में उस अल्पमत सरकार ने राष्ट्रनायक के घर की जासूसी करवानी शुरू की और सिर्फ 4 महीने में इसकी पोलपट्टी खुल गयी.

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नाकारा लोगों के चलते देश की माली हालत ख़राब होने लगी और देश के पास इतना धन भी नहीं बचा कि अगले सात दिन का तेल विदेशो से खरीद सके. ऐसे में सोना गिरवी रखवाया गया और भुगतान संतुलन साधने का प्रयास किया गया. देश शर्म से गड गया, भारत माँ का भाल झुक गया. अब सिवाय फिर चुनाव में जाने के और नई स्थायी सरकार बनाने के कोई उपाय नहीं बचा.

दलाली के आरोप की कालिख पहली बरसात में ही धुल गयी थी ..कच्चे रंग थे ..जल्दी उतर गए. जनता आशान्वित थी. भारत 21 वीं सदी के मुहाने पर था. युवा लोग कंप्यूटर पर उँगलियाँ चलाना सीख रहे थे तभी चुनाव के दौरान उस अल्पमत कार्यवाहक सरकार ने ये जानते हुए भी कि राष्ट्रनायक की जान को खतरा है, उसकी माँ की इसी तरह हत्या की जा चुकी है, फिर भी उसकी सुरक्षा में कटौती कर दी.
महारथी के रथचक्र से रौंदी गयी भारतभूमि ज़ख़्मी थी, भारत माँ के कई लाल अपना रक्त देकर माँ का आंचल लाल कर चुके थे. ज़ख्मो से आक्रोश का लावा रिसता जाता था ऐसे में राष्ट्रनायक ने अपनी सद्भावना यात्रा शुरू की. टूटे हुए दिलों को जोड़ने का काम शुरू किया. दरारे पाटने का क्रम शुरू हुआ. यात्रा जहाँ जाती ..लाखों की भीड़ स्वागत को उमड़ पड़ती. लोग लिपट जाते, छूने को बेताब रहते. साथ ही खतरा भी बढ़ने लगा था.

शहर दर शहर दिलों को जोड़ता- देश को एक सूत्र में बाँधता हुआ वो नायक अंतत: श्रीपेरुम्बदूर पहुँच गया जहाँ एक विस्फोट ने मेरे युवा सपने को तार तार कर दिया. नियति ने वज्रपात कर दिया था.

मैं स्वयं कक्षा 12 का छात्र था और मेरे शहर इंदौर में भी वो नायक आने वाला था. दोपहर तीन बजे विमान इंदौर उतरा और जन सैलाब के चलते नायक को इंदौर के ह्रदय राजवाडा तक 6-7 km का सफर तय करने में 8-9 घंटे लग गए.

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मैं स्वयं प्रतीक्षारत था, सिर्फ देखना और सुनना चाहता था अपने नायक को लेकिन जब उसकी खुली जीप सामने आई तो उस सुदर्शन छवि को देखकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया और यंत्रवत कूद पड़ा उस खुली जीप पर ताकि उस व्यक्ति छू कर देख सकूँ. उससे हाथ मिलाते ही सुरक्षा कर्मियों ने मुझे भीड़ में उछाल दिया. इतना विराट व्यक्तित्व मैंने न कभी उस दिन के पहले देखा न कभी देख पाऊंगा.

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शहर दर शहर दिलों को जोड़ता- देश को एक सूत्र में बाँधता हुआ वो नायक अंतत: श्रीपेरुम्बदूर पहुँच गया जहाँ एक विस्फोट ने मेरे युवा सपने को तार तार कर दिया. नियति ने वज्रपात कर दिया था.

शोकग्रस्त राष्ट्र, आहत राष्ट्र, अपने स्वप्नभंग से मुरझाए राष्ट्र और एक नाउम्मीद राष्ट्र ने नायक के दल को जनादेश तो दिया लेकिन वो नायक जा चुका था.
वो नायक कहीं नहीं गया
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राजीव मरते नहीं …..राजीव मरा नहीं करते
राजीव आज भी उस दौर के युवाओं के दिल में धड़कते हैं..धडकते रहेंगे
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अश्रुपूरित श्रद्धांजलि
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“न जाने कितने चराग़ों कि मिल गयी शुहरत
इक आफ़्ताब के बे-वक़्त डूब जाने से”

(शेर -इकबाल अशर साहब का है)

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